रूढ़ियाँ और परम्पराएँ (Traditions and dogmas)

हमारे समाज की कुछ रूढ़ियाँ और परम्पराएँ इतनी निर्मम और कठोर हैं कि उनमें पिसकर मनुष्य का जीवन नर्क बन जाता है |

हमारी संस्कृति संसार की सबसे पुरानी संस्कृतियों में से एक है | अन्य पुरानी संस्कृतियाँ नष्ट हो गयी है किन्तु हम अब तक अपने को बचाए हैं | इस लंबे समय के दौरान हमारे समाज में परम्पराओं के नाम पर कई बुराइयाँ आ गयी | बाल-विवाह, सती प्रथा, लड़कियों से भेदभाव, अस्पृश्यता, दहेज़ प्रथा जैसी बातें हमारे समाज का एक हिस्सा बन गयी | ये रूढ़ियाँ और परम्पराएँ इतनी कठोर व निर्मम है कि इनके कारण समाज के एक बड़े हिस्से का जीवन नर्क बन गया |

पिछले १००-१५० वर्षों में अनेक समाज सुधारकों ने इन परम्पराओं के विरुद्ध आवाज उठाई, आंदोलन किये | इसका नतीजा हुआ कि अब सती प्रथा जैसी कई अमानवीय परम्पराएँ लगभग समाप्त हो गयी हैं | बाल विवाह, अस्पृश्यता, सती प्रथा आदि कानूनन अपराध घोषित कर दिए गए हैं, जिनके कारण अब इनका प्रभाव काफी कम हो गया है | लेकिन अब भी कुछ ऐसी परम्पराएँ समाज में घर के बैठी हुई है जिनसे अनेक लोगों का जीवन बर्बाद हुआ है |

आये दिन समाचारपत्रों में हम एक ही गोत्र में विवाह करने के कारण होनेवाली हत्याओं के बारे में सुनते रहते हैं | उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से में एक ही गोत्र में विवाह बहुत बड़े सामजिक अपराध के रूप में देखा जाता है | ऐसा करनेवाले को समाज से बहिष्कार से लेकर मृत्यु तक का दंड दिया जाता है | देश की कई खाप पंचायतें इस तरह के फरमान कई बार दे चुकी है | ऐसे समय में देश का कानून ही लोगों का रक्षक होता है, पर हमारी पुलिस खाप पंचायतों के ऐसे आपराधिक फैसलों को रोकने में नाकामयाब हुए हैं | अब भी समाचारपत्रों में एक ही गोत्र में विवाह के कारण होनेवाली हत्याओं की खबरें छपती रहती हैं |

लडके-लड़कियों में भेदभाव भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है | देश में लड़कों के अनुपात में लड़कियों की संख्या दिन ब दिन घटती जा रही है | कन्या भ्रूण हत्या गैरकानूनी होने के बावजूद रुकी नहीं है | बेटे की चाह, वंश आगे बढ़ने का झूठा अभिमान, बेटी को पराया धन और बोझ मानना इन सबके कारण कई कन्याओं की गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है | झूठे अभिमान के लिए लोग हत्या का कलंक लेने में भी पीछे नहीं हटते |

दहेज़ प्रथा ने भी पिछले कुछ समय में विकराल रूप ले लिया है | दहेज़ विरोधी कानून बनने के बावजूद यह समस्या हल नहीं हुई है | पहले जो जातियाँ दहेज़ नहीं लेती थी अब वो भी दहेज़ लेने लगी हैं | दहेज़ न लाने या कम दहेज़ लाने के कारण कितनी स्त्रियों का उत्पीडन हुआ है, इसकी कोई गिनती ही नहीं | मारने-पीटने से लेकर जिन्दा जलाने तक की घटनाएँ हुई हैं |

इस प्रकार हम पाते हैं कि हमारी पुरातन संस्कृति ने हमें कई अनुपम उपहार तो दिए हैं किंतु इतने वर्षों सभ्य समाज पर कलंक लगनेवाली कुछ परम्पराएँ और रूढ़ियाँ विकसित हो गयी हैं | यह परम्पराएँ व रूढ़ियाँ इतनी निर्मम और कठोर हैं कि इनमे पिसकर मानव का जीवन नष्ट हो जाता है | मानवता को शर्मसार करनेवाली इन परम्पराओं का भारतीय समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए |

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