स्वदेश-प्रेम (Swadesh Prem)

कवि : रामनरेश त्रिपाठी

क) अतुलनीय जिनके प्रताप का …………………………. जिनका विजय-घोष रण-गर्जन |
१) प्रस्तुत पद्यखंड किस कविता से लिया गया है ? कवि का परिचय दो |
उत्तर: प्रस्तुत पद्यखंड स्वदेश-प्रेम कविता से लिया गया है | इसके कवि श्री रामनरेश त्रिपाठी हैं | त्रिपाठीजी एक आदर्शवादी कवि थे | इनकी रचनाओं में राष्ट्रीयता के साथ-साथ आदर्श का पुट भी मिलता है | इनकी भाषा सरल, सरस, प्रवाहमय तथा बोधगम्य है | ‘पथिक’, ‘मिलन’, ‘स्वप्न’, ‘ग्राम्यगीत’ तथा ‘कविता कौमुदी’ इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं |

२) कवि किसके प्रताप की चर्चा कर रहा है ?
उत्तर: कवि हमारे देश के पूर्वजों की वीरता, साहस और महानता का वर्णन इस कविता में कर रहा है | उनके प्रताप को पूरे संसार ने देखा है | सूर्य एवं चंद्र स्वयं इस बात के साक्षी हैं | इस प्रकार कवि देश के पूर्वजों के गुणों का वर्णन व उनके प्रताप की चर्चा कर रहा है |

३) सूर्य, चंद्र, तारे तथा आकाश किस बात के साक्षी हैं ?
उत्तर: सूर्य, चंद्र, तारे तथा आकाश हमारे पूर्वजों के अतुलनीय प्रताप के साक्षी हैं | भूतकाल में हमारे पूर्वजों की निर्मल कीर्ति पूरे संसार में फैली हुई थी | अपनी वीरता से उन्होंने अनेक युद्ध जीते थे | सूर्य, चंद्र, तारे तथा आकाश इन सब बातों के साक्षी हैं |

४) पद्यांश से क्या भाव प्रकट हो रहा है ?
उत्तर: प्रस्तुत पद्यांश देशभक्ति के भाव से ओत-प्रोत है | कवि हमें हमारे भूतकाल की स्मृति करा रहा है जब भारत देश पूरे संसार में श्रेष्ठ था | देश धन-धान्य से संपन्न, अध्यात्म की ऊँचाइयों को छूता हुआ संसार के शक्तिशाली देशों में से एक हुआ करता था | हमारे पूर्वजों ने आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक क्षेत्रों में अभूतपूर्व उन्नति की थी | उन्होंने पूरे संसार में भारत का डंका बजाया था | लेखक वही सब याद दिलाकर हम में देशप्रेम की भावना भरना चाहता है |

ख) शोभित है सर्वोच्च मुकुट से, …………………………. जिसके विस्तृत वक्ष स्थल पर |
१) सर्वोच्च मुकुट से कवि क्या संकेत दे रहा है ?
उत्तर: हिमालय पर्वत भारत देश के उत्तर में है | वह संसार का सबसे ऊँचा पर्वत है | वह जिस तरह भारत देश की उत्तरी सीमा को घेरा हुआ है, उसे देखकर ऐसा लगता है जैसे भारत माता को किसी ने मुकुट पहनाया हो | सर्वोच्च मुकुट से कवि का तात्पर्य हिमालय पर्वत से है |

२) सब दिशाओं में क्या गूँज रहा है ?
उत्तर: भारत देश ने भूतकाल में अप्रतिम प्रगति की थी | सफलता की ऊँचाइयों को छूआ था | अपनी अतुलनीय वीरता से अगणित युद्ध जीते थे | उनकी जयजयकार सब दिशाओं में गूँज रही है |

३) हिमगिरिवर कौन है ? वह किस बात का साक्षी है ?
उत्तर: हिमगिरिवर शब्द यहाँ हिमालय के लिए प्रयोग हुआ है | हिमालय पर्वत लगभग पूरा वर्ष बर्फ से ढँका रहता है, इसलिए उसे कवि ने हिमगिरिवर कहा है | भूतकाल में हमारे देश के पूर्वजों ने महानता की ऊँचाइयों को छूआ था, उसकी महिमा का साक्षी स्वयं हिमालय है |

४) विमान दल के उतरने का आशय स्पष्ट कीजिये |
उत्तर: विमान दल के उतरने की बात कह कर कवि भूतकाल में भारत द्वारा की गयी वैज्ञानिक तथा भौतिक प्रगति की ओर संकेत कर रहा है | भारत का समुद्री व्यापार बहुत बढ़ा-चढ़ा था | इस वजह से भारत में समुद्री जहाजों का आना-जाना लगातार लगा रहता था | कवि इसे ही भारत के वक्ष-स्थल पर विमान का उतरना कह रहे हैं |

ग) सागर निज छाती पर जिनके, ……………………………. पाओगे तुम इनके तट पर |
१) सागर के अगणित पोत अपनी छाती पर उठाने से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: भूतकाल में भारत का समुद्री व्यापार बहुत बढ़ा-चढ़ा था | भारत का समुद्री किनारा अपेक्षाकृत शांत होने की वजह से वह समुद्री व्यापार के लिए बहुत अनुकूल है | इस वजह से भारत में समुद्री जहाजों का आना-जाना लगातार लगा रहता था | संसार के कई देशों से जहाज भारत आते थे और भारत से सामान खरीद कर ले जाते थे | इसलिए कवि ने लिखा है कि सागर ने अनगिनत समुद्री जहाज अपनी छाती पर उठाया है |

२) भारत देश के विकास में समुद्र का क्या योगदान है ?
उत्तर: भारत को मिले विशाल समुद्री किनारे के कारण भारत को अनेक लाभ होते हैं | समुद्र से कई कीमती चीजें, रत्न, खनिज तेल इत्यादि मिलते हैं | इतने बड़े समुद्र किनारे के कारण बड़े पैमाने पर मत्स्य व्यवसाय होता है | भारत का समुद्री व्यापार भी बहुत ज्यादा विकसित हुआ है | करोड़ों लोगों को इसके कारण व्यवसाय मिलता है | इस प्रकार भारत देश के विकास में समुद्र का बहुत बड़ा योगदान है |

३) कवि चरण चिन्हों को खोजने को क्यों कह रहा है ?
उत्तर: भारत के साहसी लोगों ने इतिहास में अनेक स्थलों की साहसी यात्रा की थी | संसार के कोने-कोने से हमारा समुद्री व्यापार होता था | आज भी संसार के अनेक नदियों तथा समुद्रों के किनारे ऐसे चिन्ह मिल जाते हैं, जिससे पता चलता है कि भारत का व्यापार प्राचीन काल में कितना विकसित था |

४) प्रस्तुत पद्यखंड किस समय का इतिहास बता रहा है ?
उत्तर: प्रस्तुत पद्यखंड भारत में अंग्रेजों के राज्य स्थापित होने से पहले का इतिहास बता रहा है | भारत उस समय संसार का सबसे समृद्ध देश था | देश को सोने की चिड़िया कहते थे | भारत से बहुत सारी चीजें पूरे संसार को निर्यात की जाती थी | राजा कृषि तथा व्यापार को बहुत प्रोत्साहन देते थे | देश के व्यापारी लंबी-लंबी समुद्री यात्राओं पर जाकर सुदूर देशों से व्यापार करते थे | हम कह सकते हैं कि यह सत्रहवीं सदी से पहले के इतिहास का वर्णन है |

घ) विषुवत-रेखा का वासी जो, ………………………….. उसको हे वीरों के वंशज |
१) विषुवत रेखा के निवासी का देशप्रेम क्यों आदरणीय है ?
उत्तर: विषुवत रेखा के आस-पास का क्षेत्र मनुष्यों के रहने के लिए बहुत ज्यादा अनुकूल नहीं है | वहाँ दिन में बहुत गर्मी होती है तथा दोपहर से शाम होते-होते भारी वर्षा होने लगती है | इतनी अधिक गर्मी तथा इतनी ज्यादा वर्षा के कारण लोगों का जीवन वहाँ बहुत तकलीफदेह है | इसके बावजूद विषुवत रेखा के निवासी अपने देश से अपार प्रेम करते हैं, इसलिए उनका देशप्रेम आदरणीय है |

२) ध्रुवों पर मनुष्य जीवन मुश्किल क्यों होता है ?
उत्तर: पृथ्वी के ध्रुवों पर सूर्य की किरणें बहुत कम पहुँचती है | इस वजह से वहाँ का तापमान बहुत कम होता है | वर्ष में ६ महीने की रात और ६ महीने का दिन होता है | पूरा प्रदेश बर्फ से ढँका होता है | वहाँ का मनुष्य जीवन बहुत कठिन होता है | वहाँ के लोगों का ज्यादातर समय ठंड में तथा अँधकार में बीतता है |

३) भारत देश में जन्म पाकर हम क्यों धन्य हैं ?
उत्तर: संसार के किसी भी भाग में शायद ही प्रकृति मनुष्य जीवन के लिए इतनी अनुकूल है जितने की भारत देश में | भारत देश धन-धान्य से समृद्ध व प्राकृतिक संपदाओं से संपन्न है | यहाँ की जलवायु ऐसी है कि मनुष्य को मौसम की वजह से बहुत ज्यादा कष्ट उठाने नहीं पड़ते | हमारे यहाँ वर्ष के बारहों महीने खेती हो सकती है | इसलिए कवि हमारे देश को धरा शिरोमणि कहते हैं | ऐसे देश में जन्म पाकर हमारा जीवन धन्य है |

४) “किसी भी परिस्थिति में मातृभूमि का त्याग नहीं करना चाहिए” कवि इस बात की प्रेरणा कैसे देते हैं?
उत्तर: कवि भारत भूमि की प्रशंसा करते हुए उसे धरा शिरोमणि कह रहे हैं | हम इसी भारत भूमि की मिट्टी में पले-बढ़े हैं | इसका अन्न जल ग्रहण कर हमने जीवन जिया है | मातृभूमि तो स्वर्ग से भी श्रेष्ठ होती है | इसलिए मनुष्य को किसी भी परिस्थिति में मातृभूमि का त्याग नहीं करना चाहिए |

ङ) जब तक साथ एक भी दम हो …………………………….. काया-रूपी वस्त्र बहाकर |
१) कवि किन शब्दों में स्वाभिमान की प्रेरणा दे रहा है ?
उत्तर: जब तक मनुष्य की एक भी साँस बाकी हो, दिल की एक भी धड़कन बची हो, मनुष्य को कभी भी, कहीं भी अपना सर नहीं झुकाना चाहिए | हर परिस्थिति में अपना आत्मसम्मान बनाये रखना चाहिए | जब तक शरीर में एक बूँद भी रक्त है, जब तक शरीर में शत्रु को जीतने की शक्ति है, तब तक मनुष्य को किसी से प्रार्थना नहीं करनी चाहिए |

२) यहाँ शत्रुंजय शब्द का प्रयोग किसके लिए और क्यों किया गया है ?
उत्तर: यहाँ शत्रुंजय शब्द का प्रयोग हम भारतवासियों के लिए किया है | भारतभूमि में अनेकानेक वीर योद्धा पैदा हुए हैं | हमने अगणित बार शत्रुओं को युद्ध में जीता है | युद्ध में कभी कायरता नहीं दिखाई है | युद्धभूमि में मृत्यु भी प्राप्त हो तो हमें उसका भय नहीं होता | इसलिए कवि ने शत्रुंजय शब्द का प्रयोग किया है अर्थात हम भारतवासी शत्रु को जीतनेवाले हैं |

३) मनुष्य को मृत्यु का भय क्यों नहीं होना चाहिये ?
उत्तर: मनुष्य के मन में मृत्यु का भय नहीं होना चाहिए | मृत्यु अंत नहीं है | यह एक विश्राम स्थल की तरह है, जहाँ जीवन से थका-हारा हुआ जीव आता है | एक नया जीवन जीने के लिए ऊर्जा संचित करता है | अपने पुराने शरीर को छोड़कर जीव एक नया शरीर धारण करता है तथा पुनः संसार में आ जाता है | इसलिए मनुष्य को निर्भय होकर मृत्यु का स्वागत करना चाहिए |

४) कवि ने मृत्यु को सरिता क्यों कहा है ?
उत्तर: जिस तरह मनुष्य सरिता में स्नान करने के बाद बिलकुल तरोताजा होकर निकलता है, उसी तरह मनुष्य भी जब मृत्यु की गोद में आता है, तो वो अपने पिछले जन्म की सारी यादें, सारे कष्ट, सारी थकावटों को पीछे छोड़ देता है | अपने जर्जर शरीर का त्याग करता है | एक नया शरीर धारण करता है | नवीन जीवन ऊर्जा लेकर दोबारा संसार में संघर्ष के लिए आ जाता है | सरिता की तरह मनुष्यजीवन को नई स्फूर्ति देने के कारण कवि मृत्यु को सरिता कहते हैं|

च) सच्चा प्रेम वही है ……………………………. मनुष्यता होती है विकसित |
१) कवि के अनुसार सच्चे प्रेम के क्या लक्षण हैं ?
उत्तर: कवि के अनुसार सच्चा प्रेम वही है जिसमें त्याग की भावना हो | अपने प्रिय के लिए आत्मबलिदान की भावना ही प्रेम का सर्वोच्च प्रमाण है | त्याग के बिना प्रेम निष्प्राण होता है | यदि प्रेम की भावना स्वार्थ पर विजय न पा सके, तो वह सच्चा प्रेम नहीं है | सच्चे प्रेम में व्यक्ति को प्राणों का भी मोह नहीं होता | वह अपना सर्वस्व लुटाने को भी तैयार रहता है |

२) कवि ने देशप्रेम को पुण्य क्षेत्र क्यों कहा है ?
उत्तर: देशप्रेम मनुष्य के ह्रदय की सर्वश्रेष्ठ भावना है | जिस मातृभूमि की मिट्टी में खेलकर हम बड़े हुई है, उसके लिए अपना तन-मन-धन समर्पित करने के लिए देश का प्रत्येक नागरिक हमेशा तैयार रहता है | लोग देश की रक्षा, उसके विकास और उसके हित के लिए अपना जीवन तक न्योछावर कर देते हैं | भारत देश के लिए बलिदान देने वालों का लंबा इतिहास रहा है | देश को आज़ादी दिलाने के लिए तथा आज़ादी के बाद आक्रमणकारी देशों से भारत की रक्षा के लिए अनेक देशवासी शहीद हो गए | इसलिए कवि देश प्रेम को पुण्य क्षेत्र कहता है, क्योंकि देश के लिए बलिदान देने से बड़ा पुण्य कर्म और कुछ नहीं है |

३) मनुष्यता कैसे विकसित होती है ?
उत्तर: कवि के अनुसार देशप्रेम की भावना से मनुष्यता विकसित होती है | देश के लिए मनुष्य अपना सब कुछ बलिदान करने को तैयार रहता है | यह त्याग की भावना उसकी आत्मा को जगाती है | उसमें मानवीय गुणों का विकास होता है | वह सच्चे प्यार का अर्थ समझ पाता है | देशप्रेम के कारण उत्पन्न यह बलिदान और प्यार की भावना मनुष्यता को विकसित करती है |

४) प्रस्तुत कविता से कवि क्या संदेश देना चाहते हैं ?
उत्तर: प्रस्तुत कविता राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा देने के लिए लिखी गयी है | इस कविता द्वारा कवि हमें यह संदेश दे रहे हैं कि मनुष्य को अपने देश से अपार प्रेम होना चाहिए | देश हित के लिए उसे हर क़ुरबानी देने को तैयार रहना चाहिए | यदि देश की रक्षा के लिए हमें प्राण देना पड़े तो उससे भी पीछे नहीं हटना चाहिए | कवि हमें भारत देश के गौरवशाली इतिहास का स्मरण कराते हुए बता रहे हैं कि हमारे देश ने भूतकाल में जिन ऊँचाइयों को छूआ था, हम आज भी उन्हें पुनः छूने में समर्थ हैं |

अतिरिक्त प्रश्न
१) देशप्रेम तथा राष्ट्रीयता की भावना मनुष्य से असंभव कार्य भी संभव करा देती है | इस विषय पर अपने विचार लिखिए |
उत्तर: यदि मनुष्य का उद्देश्य महान हो तो वो कई बार असंभव लगनेवाले कार्य भी संभव कर दिखाता है | देशप्रेम तथा राष्ट्रीयता से बड़ा और पवित्र उद्देश्य क्या हो सकता है ! हिमालय की चोटियों पर रक्त को जमा देने वाले तापमान में हमारे सिपाही दिन रात पहरा दिए खड़े रहते हैं | उस तापमान में तो जीना भी संभव नहीं है | इसके बावजूद कई-कई वर्ष उन बर्फीली पहाड़ियों में गुजर जाते हैं | इतिहास में भी ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं | यूरोप में जब चौदहवी तथा पंद्रहवी शताब्दी में राष्ट्रवाद का उदय हुआ, उसके बाद उन देशों ने अपार प्रगति की | ऐसे-ऐसे कार्य कर दिखाए जो उस समय तक असंभव समझे जाते थे | लम्बी समुद्री यात्राएँ, अनगिनत वैज्ञानिक आविष्कार सब उसी का नतीजा है | इससे हमें पता चलता है कि देशप्रेम तथा राष्ट्रीयता की भावना मनुष्य से असंभव कार्य भी संभव करा देती है |

२) भारत का गौरवशाली इतिहास हमें किस प्रकार प्रेरणा देता है ?
उत्तर: भूतकाल में भारत ने भौतिक, सांस्कृतिक तथा अध्यात्मिक क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की थी | भारत संसार के सबसे संपन्न तथा शक्तिशाली देशों में से एक हुआ करता था | हमारे पूर्वज पुरुषार्थी तथा पराक्रमी थे | उन्होंने संसार के अनेक देशों की यात्राएँ की और व्यापार को बढाया | इससे हमारे देश के साथ-साथ अन्य देशों में भी संपन्नता बढ़ी | हमारे देश की संस्कृति का प्रभाव हमारे पड़ोसी देशों पर भी पड़ा | भारत अनेक धर्मों का उद्गमस्थल तथा आश्रयस्थल रहा है | हमारा यह गौरवशाली इतिहास हमें प्रेरणा देता है कि हम भारत को पुनः उपलब्धियों के उस शिखर पर ले जाए | देश पुनः सुजलाम-सुफलाम बने तथा विश्वगुरु के पद पर आसीन हो |

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  1. Shyam April 2, 2017

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