श्रम की प्रतिष्ठा (Shram ki pratishtha)

लेखक: आचार्य विनोबा भावे

क) लेकिन सिर्फ़ कर्म करने से कोई कर्मयोगी नहीं होता |
१) उपर्युक्त पंक्ति का प्रसंग लिखिए |
उत्तर: उपर्युक्त पंक्ति आचार्य विनोबा भावे द्वारा रचित “श्रम की प्रतिष्ठा” नामक निबंध से ली गयी है | लेखक यहाँ बता रहे हैं कि सिर्फ कर्म करने से मनुष्य कर्मयोगी नहीं हो सकता | जब तक मन में कर्म को पूजा समझकर न किया जाए व्यक्ति कर्मयोगी नहीं हो सकता | इसके लिए विनोबाजी मजदूरों का उदाहरण देते हैं | दिनभर कर्म में व्यस्त रहने के बावजूद उनके जीवन में कई पाप दिखते हैं | इसका कारण है कि उन्हें अपने कर्म से प्रेम नहीं है, वो उसे बोझ समझकर करते हैं | इसलिए वो कर्मयोगी नहीं है | कर्मयोगी होने के लिए कर्म तथा कर्म के प्रति प्रेम, दोनों आवश्यक है |

२) लेखक ने शेषनाग किन्हें कहा है और क्यों |
उत्तर: लेखक ने परिश्रम करनेवाले किसानों तथा मजदूरों को शेषनाग कहा है | पुराणों में वर्णित है कि यह पृथ्वी शेषनाग के मस्तक पर स्थित है | यह धरती भी दिनभर शरीर श्रम करनेवाले मजदूरों पर टिकी है | वे अपनी मेहनत से संसार के लिए आवश्यक सारे चीजों को खेतों में उगाते हैं या कारखानों में बनाते हैं | उनकी वजह से ही यह संसार चल रहा है | इसलिए लेखक ने उन्हें शेषनाग कहा है |

३) भारत में लोग किस प्रकार का श्रम करते हैं और कहाँ–कहाँ ?
उत्तर: भारत में लोग तरह-तरह के श्रम करते हैं | कुछ लोग खेतों में काम कर अनाज उगाते हैं तो कुछ कारखानों में काम कर जीवन के लिए आवश्यक दूसरी चीजें बनाते हैं | कुछ लोग रेलवे में काम कर, पैदा की हुई चीजों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाते हैं |

४) धर्मपुरुष कौन है ? निबंध के आधार पर स्पष्ट करें |
उत्तर: जो व्यक्ति अपने मेहनत की रोटी खाता है, लेखक के अनुसार वो धर्मपुरुष है | मेहनत करनेवाले के जीवन में पाप का प्रवेश नहीं होता | वे दिनभर मेहनत करते हैं तो रात को उनको अच्छी नींद भी आती है | उनके जीवन में पाप के चिंतन के लिए समय ही नहीं होता | उन्हें दिन में काम करने तथा रात में सोने से फुर्सत नहीं मिलती | जीवन में पाप के प्रवेश की गुंजाईश न होने के कारण लेखक मजदूरों को धर्मपुरुष कहता है |

ख) उसके जीवन में पाप है तो आश्चर्य नहीँ क्योंकि उसके पास समय फाजिल पड़ा है |
१) किसके जीवन में पाप बताया गया है ?
उत्तर: जो अपने जीवन में मेहनत नहीं करता, जिसके पास खाली समय पड़ा होता है | लेखक के अनुसार ऐसे व्यक्ति के जीवन में पाप होता है | इसके अलावा मेहनत करनेवाला व्यक्ति भी यदि अपने कार्य से प्रेम नहीं करे, अपने काम को बोझ समझे, तो उसके जीवन में भी पाप प्रवेश कर जाता है |

२) खाली समय वाले व्यक्ति के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर: खाली दिमाग शैतान का दिमाग होता है | जिस व्यक्ति के जीवन में खाली समय होता है तो उसके मन में पाप प्रवेश कर जाता है | जहाँ समय फाजिल पड़ा होता है वहाँ शैतान का काम शुरू होता है | इसलिए फुरसती लोगों के जीवन में पाप दीखता है |

३) लेखक ने किन लोगों के प्रति चिंता व्यक्त की है ?
उत्तर: लेखक ने काम करनेवालों, मेहनतकश लोगों के प्रति चिंता व्यक्त की है | उन्हें अब अपने काम से प्रेम नहीं रहा | वो उसे एक बोझ समझकर करते हैं | जिसके कारण उनके जीवन में भी पाप प्रवेश कर रहा है | इसके अलावा हमारे देहात के लोग भी हैं, जो जीवन में खूब मेहनत करते हैं | पर वो यह नहीं चाहते कि उनके बच्चे श्रम करें | वो उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं ताकि उन्हें काम न करना पड़े | अब शिक्षा का उद्देश्य भी काम से बचना हो गया है | इसलिए लेखक चिंतित है |

४) लेखक हमें क्या संदेश दे रहे हैं ?
उत्तर: लेखक हमें संदेश दे रहे हैं कि मनुष्य के जीवन में श्रम का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है | मेहनत वाले कार्यों को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए न ही मेहनत का कार्य करनेवालों को कभी हीन समझना चाहिए | जीवने में शारीरिक श्रम का अपना स्थान होता है | उससे बचने की कोशिश करने पर या उसे बोझ समझकर करने पर मनुष्य के जीवन में पाप प्रवेश कर जाता है | इसलिए मनुष्य को चाहिए जीवन में जो भी कार्य करना पड़े, उससे पीछे न हटे | पूजा समझकर उस कार्य को करने से मनुष्य कर्मयोगी बन जाता है |

ग) काम के प्रति ऐसी घृणा मजदूरों में है | काम न करने वालों में तो है ही |
१) उपर्युक्त अवतरण का प्रसंग सपष्ट कीजिए |
उत्तर: उपर्युक्त पंक्ति आचार्य विनोबा भावे द्वारा रचित “श्रम की प्रतिष्ठा” नामक निबंध से ली गयी है | लेखक इसमें बता रहे हैं कि आज कल देहाती लोग, मजदूर लोग अपने बच्चों को शिक्षा दिलाना चाहते हैं पर उस शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान अर्जन या विवेक विकसित करना नहीं है | वो चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़े तथा कोई ऐसी नौकरी करे जिसमें बहुत ज्यादा मेहनत न करना पड़ता हो | उनके मन में अब मेहनत के प्रति घृणा का भाव आ गया है | इसलिए लेखक ने कहा है कि काम न करनेवाले तो काम से घृणा करते ही हैं | काम करनेवाले भी उसे बोझ समझकर उससे घृणा करने लगे हैं |

२) देहाती लोग क्या सोचने लगे हैं और क्यों ?
उत्तर: देहाती लोग आज कल अपने बच्चों को शिक्षा दिलाना चाहते हैं पर उस शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान अर्जन या विवेक विकसित करना नहीं है | वो चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़े तथा कोई ऐसी नौकरी करे जिसमें बहुत ज्यादा मेहनत न करना पड़ता हो | उन्हें जितना काम करना पड़ रहा है, उनके बच्चों को उतना न करना पड़े | उनके मन में अब मेहनत के प्रति घृणा का भाव आ गया है | वो मेहनत के कार्यों को बोझ समझकर करते हैं |

३) दिमागी काम करने वाले लोग मजदूरों को क्या समझते हैं ?
उत्तर: दिमागी काम करने वाले लोग मेहनत के काम करनेवालों को नीच मानते हैं | वो उनसे कम से कम पैसों में अधिक से अधिक काम करवाना चाहते हैं | उनके काम का मूल्य भी दिमागी काम से कम रखा गया है | इस प्रकार मेहनतकश लोगों को दोयम दर्जे का समझा जाने लगा है |

४) मजदूर की मानसिकता कैसी बनती जा रही है ?
उत्तर: मजदूर की मानसिकता अब काम से मन चुरानेवाली होती जा रही है | पहले जो लोग काम नहीं करते थे, वही काम से घृणा करते थे | आज कल स्थिति बदल गयी है | अब काम करनेवाले किसान व मजदूर भी काम से घृणा करने लगे हैं | वो काम को एक बोझ समझकर करते हैं और किसी भी तरह उससे छुटकारा पाना चाहते हैं | अपने बच्चों को शिक्षा दिलाते समय भी उनके मन में यही होता है कि पढ़ लिख लेगा तो इसे हमारी तरह मेहनत नहीं करनी पड़ेगी | कहीं न कहीं आराम की नौकरी लग जायेगी |

घ) “मैंने तो उसे दीप की बाती भी जलाने नहीं दी |”
१) उपरोक्त वाक्य का प्रसंग बताइए |
उत्तर: उपरोक्त वाक्य रामायण से लिया गया है | भगवान रामजी का वनवास हुआ तो सीताजी ने कहा कि वह भी जायेंगी | उन्हें आदत नहीं थी ऐसे जीवन की पर उन्होंने निश्चय किया था कि जहाँ रामजी, वहाँ वे | जब श्रीराम की माता कौशल्या ने यह सुना तो वह चिंतित हो उठी | उन्होंने सीताजी से कभी कोई काम नहीं कराया था | इसलिए उन्होंने उपरोक्त वाक्य कहा |

२) लेखक को उपरोक्त वाक्य में क्या अच्छाई और बुराई नजर आयी ?
उत्तर: लेखक के अनुसार माता कौशल्या ने ससुराल आयी लड़की को पुत्री समान माना, उसे कष्ट नहीं होने दिया, यह अच्छी बात ऊपर के वाक्य से पता चलती है | पर साथ में काम की प्रतिष्ठा नहीं मानी, मेहनत को हीन माना यह दिख जाता है | लेखक ने इसे गलत माना है |

३) धर्मराज ने भगवान कृष्ण को काम क्यों नहीं दिया ?
उत्तर: धर्मराज ने राजसूय यज्ञ किया था | भगवान कृष्ण भी वहाँ आये थे | उन्होंने धर्मराज से काम माँगा तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया “आपको क्या काम दें | आप तो हमारे लिए पूज्य हैं, आदरणीय हैं | आपके लायक हमारे पास कोई काम नहीं है | ”

४) भगवान कृष्ण ने अपने लिए क्या काम ढूँढा ?
उत्तर: धर्मराज ने राजसूय यज्ञ किया था | भगवान कृष्ण भी वहाँ आये थे | उन्होंने धर्मराज से काम माँगा तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया “आपको क्या काम दें | आप तो हमारे लिए पूज्य हैं, आदरणीय हैं | आपके लायक हमारे पास कोई काम नहीं है |” भगवान कृष्ण के जोर देने पर उन्होंने कहा कि “आप ही अपना काम ढूँढ लीजिये |” भगवान ने अपने लिए जूठी पत्तलें उठाने और पोछा लगाने का काम ढूँढ लिया |

ङ) इस कारण अपने समाज में श्रम की प्रतिष्ठा नहीं है |
१) कर्मयोगी होने के लिए क्या आवश्यक है ?
उत्तर: कर्मयोगी होने के लिए दो चीजें आवश्यक है | पहल यह कि मनुष्य कर्म करे, कर्म करने से पीछे न हटे | दूसरा यह कि अपने कर्म को वो बोझ समझकर न करे | जिसे अपने काम से प्रेम हो तथा वो उसे उत्साह से मन लगा कर करता है, वही कर्मयोगी हो सकता है | लाचारी से काम करनेवाले कभी कर्मयोगी नहीं हो सकते |

२) हमारे समाज में श्रम की प्रतिष्ठा न होने का क्या कारण है ?
उत्तर: हमारे यहाँ समाज रचना ऐसी है जहाँ मजदूर समझते हैं कि हमें काम करने से छुट्टी मिले तो अच्छा होगा | लोग यहाँ लाचारी से काम करते हैं | काम नहीं करना या काम टालना पसंद करते हैं | इन कारणों से हमारे समाज में श्रम की प्रतिष्ठा नहीं है |

३) हमारे समाज में बहुत बड़ा बेकार वर्ग क्यों खड़ा हो गया है ?
उत्तर: हमारे समाज का यह मानना है कि ज्ञानी खा तो सकता है, आशीर्वाद तो दे सकता है पर काम नहीं कर सकता | ज्ञानी को योगी को काम से मुक्त रहना चाहिए | बूढ़ों को काम से मुक्त रहना ही चाहिए | बूढ़ों को काम देना निष्ठुरता मानी जायेगी | बूढा, बच्चा, ज्ञानी, योगी, व्यापारी, वकील, अध्यापक, विद्यार्थी, किसी को काम नहीं करना चाहिए | इससे समाज में बहुत बड़ा बेकार वर्ग खड़ा हो गया है जो कोई काम नहीं करता |

४) लोगों के काम नहीं करने का एक बड़ा कारण क्या है ?
उत्तर: लोगों के काम नहीं करने का एक बड़ा कारण यह है कि जो दिमागी काम करते हैं, उन्होंने दिमागी काम की महत्ता इतनी बढ़ा दी है कि उसे हजार रूपया देना ही उचित मानेंगे और श्रम करनेवाले को कम से कम जितना दे सकेंगे, उतना देने की कोशिश करेंगे |

च) कामों का मूल्य समान होना चाहिए |
१) महात्मा गाँधी का उदाहरण देकर लेखक ने हमें किस बात के लिए प्रेरित किया है ?
उत्तर: महात्मा गाँधी दिमागी काम खूब करते थे पर फिर भी थोड़ा सा समय निकाल कर दिन में सूत कात ही लेते थे | मनुष्य को भी चाहिए कि यदि वो दिमागी कार्य ज्यादा करता है तो किसी तरह समय निकाल कर थोडा सा श्रम का कार्य अवश्य करे | श्रम का कार्य करने वाले को भी चाहिये कि किसी तरह समय निकाल कर दिमागी कार्य भी करे |

२) श्रम की प्रतिष्ठा दोबारा कायम करने के लिए क्या करना पड़ेगा ?
उत्तर: आज कल दिमागी काम का और श्रम का मूल्य कम ज्यादा रखा गया है | दोनों में बहुत अंतर है | इस वजह से समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा श्रम के कार्यों को नीची नज़रों से देखने लगा है | यदि हमें दोबारा कर्मयोग की महिमा, श्रम की प्रतिष्ठा कायम करनी है तो दोनों तरह के कामों की कीमत में जो अंतर है, उसे कम करना होगा |

३) हमारे समाज में सफाई कर्मचारियों पर किस तरह अत्याचार हो रहा है ?
उत्तर: हमारे समाज में शरीर श्रम करनेवाले को नीचा माना जाता है | उसे किसी प्रकार की छुट्टियां नहीं देते | सफाई कर्मचारी एक दिन भी छुट्टी ले ले तो सारा शहर गंदा हो जाये | उसका समाज पर बहुत बड़ा उपकार है पर समाज में उसे नीच माना जाता है | उसे साफ़ रहने के लिए साबुन आदि भी नहीं देते | न उसे इज्जत है, न प्रतिष्ठा है, न सम्मान है | इस तरह समाज सफाई कर्मचारी के उपकार का बदला अपकार से देता है |

४) प्रस्तुत निबंध से क्या प्रेरणा मिलती है ?
उत्तर: मनुष्य जीवन में श्रम का बहुत ज्यादा महत्व है | यदि हमें अपने जीवन से पाप को दूर रखना है तो शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के कामों को करना चाहिए | अपने काम को पूजा समझ के पूरे मन से उसे पूरा करना चाहिए | किसी भी तरह के काम को छोटा-बड़ा नहीं समझना चाहिए | श्रम तथा श्रम करनेवाले दोनों को सम्मान देना चाहिए | इससे हमारे समाज में श्रम की प्रतिष्ठा बढ़ेगी |

५) अपने काम को हीन मानने से क्या-क्या हानियाँ होती हैं ?
उत्तर: अपने काम को हीन मानने वाला मनुष्य जीवन में कभी संतुष्ट और सुखी नहीं हो सकता | अपने काम के प्रति दुर्भावना उसके मन में कई पाप उत्पन्न करती है | उसे कई बुरी आदतें लग जाती हैं | उसका जीवन उसके लिए बोझ जैसा हो जाता है | वह श्रम की प्रतिष्ठा कभी नहीं समझ पाता व कर्मयोगी बनने का अवसर खो देता है | ऐसा व्यक्ति बड़ा काम करे या छोटा, उसके काम का तथा स्वयं उसका महत्व घट जाता है |

६) क्या वर्तमान भारतीय शिक्षा व्यवस्था श्रम की प्रतिष्ठा स्थापित करने में सहायक है ?
उत्तर: वर्तमान भारतीय शिक्षा व्यवस्था सिर्फ किताबी ज्ञान लेकर धन उपार्जन करना सिखाती है | लोगों के मन में यही भाव होता है कि जितनी ज्यादा शिक्षा अर्जित करो, आगे चलकर उतना ही कम श्रम करना पड़ेगा | विद्यालय में विद्यार्थियों को खेलने के सिवा और कोई ऐसा कार्य नहीं करना पड़ता जिसमें उन्हें मेहनत लगे | मेहनत के कार्यों को स्कूल के कर्मचारियों के लिए छोड़ दिया जाता है | उन्हें भी निचली श्रेणी का समझा जाता है | इन सब कारणों से हमारी शिक्षा व्यवस्था श्रम की प्रतिष्ठा स्थापित करने में बिलकुल समर्थ नहीं है |

प्र.६ “आज देहाती लोग भी कहते हैं …………………………………. उसे खटना न पड़ेगा |” (ICSE 2015)
१) काम के प्रति देहाती लोगों की मनोवृत्ति कैसी हो गई है और क्यों ?
उत्तर: हमारे देहात के लोग जीवन में खूब मेहनत करते हैं | पर वो यह नहीं चाहते कि उनके बच्चे श्रम करें | वो अपने बच्चों को शिक्षा दिलाना चाहते हैं पर उस शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान अर्जन या विवेक विकसित करना नहीं है | वो चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़े तथा कोई ऐसी
नौकरी करे जिसमें बहुत ज्यादा मेहनत न करना पड़ता हो | उनके मन में अब मेहनत के प्रति घृणा का भाव आ गया है | वो मेहनत के कार्यों को बोझ समझकर करते हैं | उन्हें पता है कि समाज में परिश्रम का मूल्य बहुत कम हो गया है | लोगों को दिमागी काम का ज्यादा पैसा मिलता है तथा शारीरिक श्रम का कम | अतः उनकी मनोवृत्ति किसी भी तरह शारीरिक श्रम से बचने की हो गई है |

२) दिमागी काम करनेवाले लोग मजदूरों के प्रति क्या विचार रखते हैं ?
उत्तर: : दिमागी काम करने वाले लोग मेहनत के काम करनेवालों को नीच मानते हैं | वो उनसे कम से कम पैसों में अधिक से अधिक काम करवाना चाहते हैं | उनके काम का मूल्य भी दिमागी काम से कम रखा गया है | इस प्रकार मेहनतकश लोगों को दोयम दर्जे का समझा जाने लगा है | दिमागी काम करनेवाले लोग मजदूरों को सम्मान की दृष्टी से नहीं देखते |

३) लेखक ने मजदूरों की तुलना किससे की है और क्यों ?
उत्तर: लेखक ने परिश्रम करनेवाले किसानों तथा मजदूरों की तुलना शेषनाग से की है | पुराणों में वर्णित है कि यह पृथ्वी शेषनाग के मस्तक पर स्थित है | यह धरती भी दिनभर शरीर श्रम करनेवाले मजदूरों पर टिकी है | वे अपनी मेहनत से संसार के लिए आवश्यक सारी चीजों को खेतों में उगाते हैं या कारखानों में बनाते हैं | उनकी वजह से ही यह संसार चल रहा है | इसलिए लेखक ने उन्हें शेषनाग कहा है |

४) प्रस्तुत निबंध का उद्देश्य लिखिए |
उत्तर : प्रस्तुत निबंध का उद्देश्य समाज में श्रम की प्रतिष्ठा दोबारा स्थापित करने के लिए लोगों को उत्साहित करना है | मनुष्य जीवन में श्रम का बहुत ज्यादा महत्व है | यदि हमें अपने जीवन से पाप को दूर रखना है तो शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के कामों को करना चाहिए | अपने काम को पूजा समझ के पूरे मन से करना चाहिए | किसी भी तरह के काम को छोटा-बड़ा नहीं समझना चाहिए | श्रम तथा श्रम करनेवाले दोनों को सम्मान देना चाहिए | इससे हमारे समाज में श्रम की प्रतिष्ठा बढ़ेगी |

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