सच्ची वीरता (Sacchi Veerata)

कवि: सरदार पूर्णसिंह

क) यह जरी, मखमल और ज़ेवरो से लदे हुए मांस के पुतले तो हरदम कांपते रहते हैं |
१) उपर्युक्त अवतरण का प्रसंग लिखिए |
उत्तर: प्रस्तुत वाक्य सरदार पूर्णसिंह की सच्ची वीरता नामक शीर्षक से ली गयी है | इसमें लेखक ने सच्चे वीरों की पहचान बताई है | लेखक के अनुसार सिंहासन पर बैठनेवाले बड़े-बड़े राजे-महाराजे वास्तव में सच्चे वीर नहीं होते | लोगों की मूर्खता ने उन्हें वीर बना रखा है | ये ऐश्वर्यवान तथा बलवान तो होते हैं पर इनका शासन लोगों के दिलों पर नहीं होता है | इसलिए इन्हें हमेशा अपना राज्य जाने का डर होता है | लेखक के अनुसार ये राजे-महाराजे जरी, मखमल तथा जेवरों से लदे हुए मांस के पुतले होते हैं जो अंदर से हमेशा डर से काँपते रहते हैं |

२) लेखक ने महात्मा, साधु और वीर के विषय में क्या कहा है |
उत्तर: महात्मा, साधु तथा वीरों का अंतःकरण सत्वगुण के समुद्र में निमग्न होता है | वे लोग अपने क्षुद्र जीवन का त्याग करके ऐसा ईश्वरीय जीवन जीते हैं कि उनके लिए संसार के कुछ अगम्य मार्ग साफ़ हो जाते हैं | आकाश उनके ऊपर बादलों के छाते लगाता है | प्रकृति उनके मनोहर माथे पर राजतिलक लगाती है | वे ही हमारे असली राजा हैं |

३) असली सच्चे राजा कौन होते हैं |
उत्तर: सच्चे राजा वही होते हैं जिनका राज लोगों के दिलों पर होता है | वे अपने प्रेम के जोर से लोगों के दिलों को सदा के लिए बाँध देते हैं | दिलों पर हुकूमत करनेवाले फ़ौज, तोप, बन्दूक आदि के बिना ही शहंशाह-इ-ज़माना होते हैं | लोग इनकी पूजा अपने ह्रदय से करते हैं |

४) लेखक ने ‘मांस के पुतले’ कहकर क्या संकेत दिया है ?
उत्तर: लेखक ने ‘मांस के पुतले’ शब्द का प्रयोग यहाँ संसार के राजाओं-महाराजाओं के लिए किया है | इस शब्द के प्रयोग द्वारा उन्होंने संकेत किया है कि भले ही वे दुनिया पर राज कर रहे हैं उनका शरीर भी वही मांस का टुकड़ा है जो एक आम आदमी का होता है | उनके कार्य भी इतने महान नहीं होते कि वो लोगों के दिलों पर राज करें तथा उनमें वीरता का भी अभाव होता है | इसलिए लेखक ने उन्हें मांस का पुतला कहा है |

ख) “मैं खुदा हूँ |”
१) उपर्युक्त कथन किसका है ? प्रसंग स्पष्ट करें |
उत्तर: उक्त कथन सूफी संत मंसूर का है | मंसूर ईश्वर के प्रेम में इस तरह लीन थे कि उन्हें लगता था कि अब वो तथा ईश्वर एक हो चुके हैं | इसलिए वो “अनहलक” अर्थात ‘मैं ईश्वर हूँ’ ऐसा कहा करते थे | उनकी यह बात उस समय के बग़दाद के राजा को पसंद नहीं आयी | उसने मंसूर को पत्थर मार-मारकर मार डालने की सजा सुनाई | लोगों ने उन्हें पत्थर मार-मारकर मार डाला पर वो यही बोलते रहे कि “मैं खुदा हूँ” |

२) उक्त कथन की क्या प्रतिक्रिया हुई ?
उत्तर: मंसूर ईश्वर के प्रेम में इस तरह लीन थे कि उन्हें लगता था कि अब वो तथा ईश्वर एक हो चुके हैं | इसलिए वो “अनहलक” अर्थात ‘मैं ईश्वर हूँ’ ऐसा कहा करते थे | उनकी यह बात उस समय के बग़दाद के राजा को पसंद नहीं आयी | उसने मंसूर को पत्थर मार-मारकर मार डालने की सजा सुनाई | लोगों ने उन्हें पत्थर मार-मारकर मार डाला पर वो यही बोलते रहे कि “मैं खुदा हूँ” |

३) कष्ट सहकर भी वक्ता ने क्या कहना जारी रखा ?
उत्तर: वक्ता मंसूर को इस बात का पूर्ण विश्वास था कि वह तथा ईश्वर एक ही है | इसलिए वो “अनहलक” अर्थात ‘मैं ईश्वर हूँ’ ऐसा कहा करते थे | उनकी यह बात उस समय के बग़दाद के राजा को पसंद नहीं आयी | उसने मंसूर को पत्थर मार-मारकर मार डालने की सजा सुनाई | लोगों ने उन्हें पत्थर मार-मारकर मार डाला पर वो यही बोलते रहे कि “मैं खुदा हूँ”, “अनहलक”, “अहं ब्रह्मास्मि”, “मैं ही ब्रह्म हूँ” |

४) वक्ता का अंत क्या हुआ और उस अंत को उन्होंने क्या समझकर स्वीकार किया ?
उत्तर: वक्ता एक सूफी संत है | उनका नाम मंसूर है | मंसूर ईश्वर के प्रेम में इस तरह लीन थे कि उन्हें लगता था कि अब वो तथा ईश्वर एक हो चुके हैं | इसलिए वो “अनहलक” अर्थात ‘मैं ईश्वर हूँ’ ऐसा कहा करते थे | उनकी यह बात उस समय के बग़दाद के राजा को पसंद नहीं आयी | उसने मंसूर को पत्थर मार-मारकर मार डालने की सजा सुनाई | लोगों ने उन्हें पत्थर मार-मारकर मार डाला पर वो यही बोलते रहे कि “मैं खुदा हूँ” | मंसूर के लिए मृत्यु की सजा बस एक खेल थी |

ग) वीर पुरुष का दिल सबका दिल हो जाता है | उसका मन सबका मन हो जाता है |
१) लेखक ने वीरता के विकास के विषय में क्या बताया ?
उत्तर: वीरता का विकास नाना प्रकार से होता है | कभी तो उसका विकास लड़ने-मरने में खून बहाने में, तलवार-तोप के आगे जान गँवाने में होता है, कभी साहित्य और संगीत में वीरता खिलती है | कभी जीवन के गूढ़ तत्व और सत्य की तलाश में बुद्ध जैसे राजा वीर हो जाते हैं | कभी किसी आदर्श पर और कभी किसी पर वीरता अपना फरहरा लहराती है| वीरता हमेशा निराली और नई होती है |

२) वीर पुरुष के क्या गुण बताए गए हैं ?
उत्तर: वीर पुरुष लोगों के दिलों पर राज्य करता है | उसका दिल सबका दिल हो जाता है | उसका मन सबका मन हो जाता है | उसके ख्याल सबके ख्याल हो जाते हैं | सबके संकल्प उसके संकल्प हो जाते हैं | उसका बल सबका बल हो जाता है | वह सबका और सब उसके हो जाते हैं |

३) वीरता निराली और नई कैसी होती है ?
उत्तर: वीरता हमेशा निराली और नयी होती है | नयापन वीरता का एक ख़ास अंग है | वीरता की कभी नक़ल नहीं की जा सकती | जैसे मन की प्रसन्नता को कोई उधार नहीं ले सकता वैसे ही वीरता भी कोई उधार नहीं ले सकता |

४) “वीरों के बनाने के कारखाने नहीं होते |” इस कथन से लेखक ने क्या स्पष्ट करना चाहा है?
उत्तर: लेखक का मानना है कि वीरों के बनाने के कारखाने नहीं होते | अर्थात किसी व्यक्ति को वीर बनाया नहीं जा सकता | वीरता का गुण मनुष्य में स्वतः विकसित होता है | लेखक ने इसके लिए देवदार के दरख्तों का उदाहरण दिया है | जिस तरह देवदार के दरख्त अपने आप उगते हैं उसी उसी तरह वीर जीवन के अरण्य में अपने आप पैदा होते हैं | वीरता का गुण बाहरी वातावरण पर निर्भर नहीं होता यह मनुष्य के अंतर्मन से प्रकट होता है |

घ) ऐसे लोग कभी बड़े मौकों का इंतज़ार नहीं करते, छोटे मौकों को ही बड़ा बना देते हैं |
१) भगवान बुद्ध ने किस तरह त्याग का उदाहरण प्रस्तुत किया ?
उत्तर: एक राजा मृग का शिकार कर रहा था | जब भगवान बुद्ध ने उसे मृग को मारते हुए देखा तब अपना शरीर आगे कर दिया जिससे मृग बच जाए | बुद्ध का शरीर भले चला जाये | इस प्रकार भगवान बुद्ध ने त्याग का महान उदाहरण पेश किया |

२) महाराजा रणजीतसिंह की वीरता का कौन सा उदाहरण लेखक ने दिया है ?
उत्तर: महाराजा रणजीतसिंह को पेशावर पर आक्रमण करना था पर रास्ते में अटक नदी पड़ती थी | अटक नदी उस समय चढ़ी हुई थी, भयंकर लहरें उठ रही थी | ऐसी हालत में अटक पार करने का उत्साह फ़ौज में नहीं था | महाराजा रणजीतसिंह ने अपना घोड़ा नदी में डाल दिया और ऐसा कहा जाता है कि अटक सूख गयी तथा पूरी सेना ने अटक पार कर लिया | इस प्रकार महाराजा रणजीतसिंह ने अद्भुत साहस तथा वीरता का परिचय दिया |
३) नेपोलियन ने सेना को एल्प्स किस तरह पार कराया ?
उत्तर: नेपोलियन एल्प्स पर्वत को पार कर शत्रु सेना पर अचानक आक्रमण करना चाहता था | पर उसकी सेना को एल्प्स पर्वत पर चढ़ना असंभव लग रहा था | नेपोलियन तुरंत सेना के सामने आया और कहा कि “एल्प्स कहीं है ही नहीं” और तुरंत पर्वत पर चढ़ गया | इससे उसकी फ़ौज को भी निश्चय हो गया कि एल्प्स है ही नहीं और पूरी सेना ने पर्वत को पार कर लिया |

ङ) हममें भीतर दृढ़ता का मलबा होता ही नहीं |
१) ईसा की महानता किस बात से प्रकट होती है ?
उत्तर: ईसा को उस समय के राजा के आदेश पर भारी कष्ट दिया गया | सलीब पर उनके शरीर को टाँगा गया | कोई पत्थर मारता, कोई ढेला मारता, कोई थूकता किंतु ईसा का दिल नहीं दहला | वह चाहते तो एक निगाह से उस राजा का तख्ता पलट सकते थे, अपनी मुसीबतों को टाल सकते थे | पर उन मुसीबतों को उन्होंने मजाक समझा, ईश्वर का उपहार समझा | इसमें उनकी महानता प्रकट होती है |

२) मीरा को मारने के लिए क्या-क्या प्रयत्न किये गए ?
उत्तर: मीरा को मारने के लिए राजा ने उसे विष का प्याला पिलाया | उस विष को मीरा ने अमृत मानकर पी लिया | उसे कुछ नहीं हुआ | मीरा को राजा ने शेर तथा हाथी के सामने डाल दिया पर दोनों ने मीरा के पैरों की धूल को अपने मस्तक पर मला और अपने रास्ते चले गए |

३) वीर पर बाहरी परिवेश का प्रभाव नहीं पड़ता, यह बात लेखक ने कैसे स्पष्ट की है ?
उत्तर: वीर पुरुष हमेशा आगे बढ़ते हैं, पीछे नहीं | वह टिन के बर्तन की तरह तुरंत गरम और तुरंत ठंडे नहीं होते | सदियों नीचे आग जलती रहे तो भी शायद ही वीर गरम होता है और हजारों वर्ष बर्फ उस पर जमती रहे तो भी वीर की वाणी तक ठंडी नहीं होती | वीर को खुद गर्म या सर्द होने से कोई मतलब नहीं होता | इस प्रकार वीर बाहरी परिवेश से अछूता रहता है |

४) अपने में वीरता का विकास करने के लिए क्या करना चाहिए ?
उत्तर: अपने अन्दर वीरता का विकास करने के लिए हमें टिन के बर्तन का स्वभाव छोड़कर अपने जीवन के केंद्र में निवास करना चाहिए और सच्चाई की चट्टान पर दृढ़ता से खड़ा होना चाहिए | अपनी जिंदगी किसी और के हवाले करनी चाहिए अर्थात दूसरों की सेवा के लिए समर्पित कर देना चाहिए ताकि ताकि जिंदगी को बचाने की कोशिशों में समय जाया न हो | बाहर की सतह को छोड़कर जीवन की अंदर की तहों में घुसे, तब नए रंग खुलेंगे | नफरत और द्वैत छोड़ देंगे, प्रेम तथा आनंद से काम लेंगे तो हमारी भी आत्मिक उन्नति होगी और हममें भी वीरता के गुण का विकास होगा |

१) वीर पर विपरीत परिस्थितियों का प्रभाव नहीं पड़ता | क्या आप इस बात से सहमत हैं ? कारण सहित बताइए |
उत्तर: सहज परिस्थितियों में सफलता प्राप्त करने से मनुष्य की वीरता का पता नहीं चलता | विपरीत परिस्थितियों के दौरान ही वीर की पहचान होती है | वीर मनुष्य ऐसी परिस्थितियों को एक चुनौती के तौर पर लेते हैं | इन चुनौतियों को सहजता से पार कर वे स्वयं को साबित करते हैं | विपरीत परिस्थितियों का वीरों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता | उनके लिए सब परिस्थितियाँ समान हैं |

२) क्या स्वयं को वीर साबित करने के लिए हमें युद्ध के मैदान में जाना जरूरी है ? युद्ध में शामिल न होनेवाला सामान्य व्यक्ति स्वयं को कैसे वीर साबित कर सकता है ?
उत्तर: स्वयं को वीर साबित करने के लिए युद्ध के मैदान में जाना जरूरी नहीं है | प्रत्येक व्यक्ति को युद्ध में भाग लेने का मौका भी नहीं मिलता | हम अपने सामान्य जीवन में भी स्वयं को वीर साबित कर सकते हैं | जीवन में अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ आती रहती है | विपरीत स्वभाव वाले लोगों से सामना होता रहता है | दुःख और कष्ट आते रहते हैं | ऐसी स्थिति में मनुष्य किस तरह इन सबका सामना करता है, इससे उसकी वीरता प्रकट होती है | यदि मनुष्य ऐसी विपरीत परिस्थितियों से प्रभावित न हो, दुखों-कष्टों से डरे नहीं, कोई व्यक्ति उसके मन में भय न उत्पन्न कर सके तो ऐसा मनुष्य वास्तव में वीर है |

३) सतोगुण से आप क्या समझते हैं ? इस गुण से युक्त व्यक्तियों की क्या विशेषता होती है ? (ICSE 2010)
उत्तर: सतोगुण से तात्पर्य है निर्मल तथा शुद्ध मन, जिसमें किसी के अहित, किसी की निंदा, किसी के अपमान, किसी से ईर्ष्या के लिए कोई स्थान न हो | ऐसे गुण वाला व्यक्ति कभी भी बाहरी परिवेश से प्रभावित नहीं होता | वह हमेशा सब के हित में लगा होता है | उसके लिए हानि-लाभ, जीवन-मरण, मान-अपमान, यश-अपयश सब समान होता है | वह कभी गलत राह पर नहीं चलता | कितना बड़ा संकट भी आए, वह हमेशा सत्य के मार्ग पर दृढ़ रहता है | ऐसे व्यक्ति मनुष्य के भेष में देवता होते हैं |

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  1. dilkhush May 14, 2017

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