नीति के दोहे -२ (Niti ke dohe-2)

कवि: रहीम

क) रहिमन निज मन की व्यथा …………………………………… पथिक आपु फिरि जाय |
१) कवि का परिचय दीजिये |
उत्तर: प्रस्तुत दोहे रहीमदासजी की रचना है | उनका पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था | इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं – ‘बरवै नायिका भेद वर्णन’, ‘रहीम सतसई’, ‘मदनाष्टक’ | रहीम जी को अरबी, फारसी, तुर्की और हिंदी भाषाओं का अच्छा ज्ञान था परंतु इनकी काव्य की भाषा ब्रज और अवधी ही है | इन्होंने नीति और भक्ति के दोहे लिखे हैं |

२) अपने मन के दुःख को दूसरों को क्यों नहीं बताना चाहिए ?
उत्तर: रहीम जी के अनुसार अपने मन के दुःख को, अपने मन में ही रखना चाहिए | दूसरों को नहीं बताना चाहिए | दूसरों को बताने से वो हमारे दुःख का मजाक बनाते हैं | हमारा दुःख उनके मनोरंजन का साधन बन जाता है | कोई उस दुःख को बाँटता नहीं है अर्थात कम नहीं करता | संसार के लोग सिर्फ सुख के साथी होते हैं, दुःख के समय कोई साथ नहीं होता |

३) कवि के मन में किसी और की छवि क्यों नहीं बैठ सकती ?
उत्तर: कवि के मन में उसके प्रियतम की छवि बसी हुई है | वह उस छवि को देखकर इतना मंत्रमुग्ध है कि किसी और की छवि देखना ही नहीं चाहता | कवि इसके लिए धर्मशाला का उदाहरण दे रहा है | जिस प्रकार धर्मशाला यदि लोगों से भरी हुई हो तो बाकी यात्री देखकर ही लौट जाते हैं | जगह खाली न होने के कारण वहाँ ठहरने का प्रयत्न नहीं करते | उसी प्रकार कवि के नेत्रों में अपने प्रियतम के अलावा किसी और की छवि के लिए जगह नहीं है | इसलिए अन्य सारी छवियाँ बाहर से ही लौट जाती हैं |

४) पथिक क्यों लौट जाता है ?
उत्तर: पथिक धर्मशाला में विश्राम के लिए आया हुआ होता है | जब वह देखता है कि धर्मशाला लोगों से भरी हुई है, अब उसमें ठहरने की जगह नहीं है तो वह लौट जाता है |

५) प्रस्तुत दोहे में कवि किस प्रियतम की छवि की बात कर रहे हैं ?
उत्तर: कवि रहीम ने ईश्वर भक्ति से संबंधित कई दोहे लिखे हैं | यहाँ भी कवि के ईश्वर की छवि ही उनके प्रियतम की छवि है | कवि इस दोहे द्वारा यह बताना चाहते हैं कि उनका मन अब पूरी तरह ईश्वर भक्ति में लग चुका है | वो पूरा समय उसी में देना चाहते हैं | संसार की किसी भी वस्तु में अब उनका मन नहीं लगता |

ख) रहिमन धागा प्रेम का ………………………………………… संपति सँचहिं सुजान |
१) रहीम जी प्रेम का धागा नहीं तोड़ने को क्यों कह रहे हैं ?
उत्तर: रहीम जी के अनुसार मनुष्यों के बीच का प्रेम धागे की तरह होता है | धागा एक बार टूट जाए तो दुबारा वैसे का वैसा जोड़ा नहीं जा सकता | जोड़ते समय उसमे गाँठ पड़ जाती है | उसी प्रकार यदि मनुष्यों का आपस में अच्छा संबंध है, प्रेम संबंध है तो उसे तोड़ना नहीं चाहिए | अगर एक बार वो संबंध टूट गया तो दुबारा जुड़ने पर भी मन में नाराजगी रह जाती है | प्रेम में एक बार दरार आ जाये तो वो दरार पूरी तरह भरती नहीं है |

२) गाँठ पड़ जाने से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: गाँठ पड़ जाने से यहाँ तात्पर्य है मन में नाराजगी रह जाना | कवि गाँठ पड़ जाना का प्रयोग करके यहाँ बताना चाहते हैं कि यदि मनुष्यों में अच्छे संबंध हो तो उसे बनाये रखना चाहिए | उसे टूटने नहीं देना चाहिए | यदि वह संबंध टूट जाए तो दुबारा मेल-मिलाप होने पर भी मन में कुछ न कुछ नाराजगी बनी ही रहती है | व्यक्तियों के बीच पुराना प्रेमभाव दुबारा नहीं आ पाता |

३) पेड़ तथा नदियों से हमें क्या सीख मिलती है ?
उत्तर: पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते | पशु-पक्षी तथा मनुष्य उन फलों का आनंद लेते हैं | नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीती | उसके चारो ओर बसने वाला प्राणी समुदाय उस पानी को पीता है तथा अनेक प्रकार के उपयोग में लाता है | हमें पेड़ों तथा नदियों से यह सीख मिलती है कि हमें अपना जीवन ऐसा बनाना चाहिए कि वह दूसरे के काम आये | परोपकार के द्वारा प्राणिमात्र की सेवा करनी चाहिए | दूसरों की सेवा करने में जीवन बिताना ही श्रेष्ठ जीवन है |

४) सज्जन व्यक्ति धन क्यों जमा करते हैं ?
उत्तर: सज्जन व्यक्ति का स्वभाव पेड़ तथा नदी की तरह होता है | पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते | पशु-पक्षी तथा मनुष्य उन फलों का आनंद लेते हैं | नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीती | उसके चारों ओर बसने वाला प्राणी समुदाय उस पानी को पीता है तथा अनेक प्रकार के उपयोग में लाता है | उसी तरह सज्जन व्यक्ति भी धन का संचय करता है पर अपने उपयोग के लिए नहीं, बल्कि समाज की सेवा के लिए | उसकी धन संपत्ति जरुरतमंदों की सहायता के काम आती हैं | परोपकार ही उनका मुख्य उद्देश्य होता है |

ग) रहिमन देखि बड़ेन को …………………………………….. जिन मुख निकसत नाहिं |
१) छोटे व्यक्तियों का त्याग क्यों नहीं करना चाहिए ?
उत्तर: रहीम जी अपने दोहे के द्वारा हमें बता रहे हैं कि बड़े तथा प्रभावशाली लोगों से मित्रता या जान पहचान होने पर हमें छोटे तथा कमजोर लोगों से संबंध नहीं तोड़ लेने चाहिए | संसार में पता नहीं कब किसकी सहायता की आवश्यकता पड़ जाए | कई बार ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं कि जहाँ बड़े लोग हमारी कोई सहायता नहीं कर पाते, पर छोटे समझे जाने वाले लोग बहुत काम आ जाते हैं | इसलिए उनका त्याग उचित नहीं |

२) सुई तथा तलवार का उदाहरण देकर रहीम जी क्या कहना चाहते हैं ?
उत्तर: तलवार दिखने में बड़ी होती है, युद्ध के समय उसका उपयोग भी बहुत महत्वपूर्ण है | सुई देखने में बहुत छोटी होती है किंतु उसका भी अपना उपयोग है | तलवार कभी भी वो काम नहीं कर सकती जो सुई कर सकती है | सुई तथा तलवार के उदाहरण के द्वारा कवि रहीम कहना चाहते हैं कि संसार में प्रत्येक व्यक्ति का महत्व होता है | हमारी मित्रता बड़े और प्रभावशाली लोगों से हो जाये तो भी हमें छोटे तथा कमजोर लोगों से संबंध नहीं तोड़ने चाहिए | प्रत्येक व्यक्ति तथा वस्तु अपनी-अपनी जगह पर महत्वपूर्ण हैं | सब अलग-अलग जगह काम आते हैं | इसलिए एक के मिलने पर दूसरे का निरादर ठीक नहीं |

३) माँगने के विषय में रहीम के क्या विचार हैं ?
उत्तर: रहीम जी के अनुसार इस संसार में किसी से कुछ माँगना बहुत ही हीन कार्य है | माँगनेवाले व्यक्ति का कोई आत्मसम्मान नहीं होता | रहीम जी माँगने वाले व्यक्ति को मरा हुआ मानते हैं | लेकिन ऐसे माँगनेवाले याचक को यदि कोई मनुष्य देने से मना कर देता है तो उसका यह कर्म, माँगने वाले व्यक्ति से भी ज्यादा हीन है | याचक को खाली हाथ लौटाने वाला व्यक्ति याचक से भी पहले मरा हुआ है |

४) माँगनेवाले व्यक्ति को मना क्यों नहीं करना चाहिए ?
उत्तर: माँगनेवाले व्यक्ति का आत्मसम्मान समाप्त हो गया होता है | अपनी जरूरतों के लिए वह अन्य पर आश्रित है | वह जीते जी एक शव के समान है | ऐसे व्यक्ति को कुछ देने से मना करना स्वयं को उससे भी हीन बनाने जैसा है | जो समर्थ होते हुए भी याचक को खाली हाथ लौटाता है, वह मृत व्यक्ति के समान है | इसलिए हमें माँगनेवाले व्यक्ति को देने से मना नहीं करना चाहिए |

अतिरिक्त प्रश्न
१) जिसे ईश्वर से प्रेम हो जाता है, उसका मन संसार में नहीं लगता | उदाहरण सहित स्पष्ट करें |
उत्तर: जिस मनुष्य को ईश्वर की भक्ति का रंग लग जाता है, उसका मन संसार की किसी वस्तु में नहीं लगता | उसके लिए यह संसार अर्थहीन हो जाता है | वह दिन-रात सिर्फ अपने ईश्वर की स्मृति में बिताता है | इस भक्ति में लोगों ने संसार के भोग-विलास, बड़े-बड़े राज्य, नाते रिश्तेदार सबका त्याग किया है | मीराबाई ईश्वर भक्ति की जीवंत मूर्ति थी | राजघराने से होकर भी वह कृष्ण-प्रेम में इतनी लीन हो गयी थी कि हमेशा कृष्ण के भजन गाकर नाचती रहती | इस कारण उसे कई बार अपार कष्ट झेलने पड़े | मृत्यु तक का सामना करना पड़ा | किंतु इसका उसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा | वह ईश्वर भक्ति में इतनी तल्लीन हो गयी थी कि अपना राज्य तक छोड़ दिया |

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