नीति के दोहे – १ (Niti ke dohe-1)

कवि: कबीर दास

क) कबीर संगति साधु की ………………………. निर्मल करे सुभाय |
१) कबीरदासजी साधु की संगति करने को क्यों कहते हैं ?
उत्तर: कबीरदासजी कहते हैं कि मनुष्य को जल्दी से आगे बढ़कर साधु पुरुष की संगति कर लेनी चाहिए | साधु पुरुष की संगति से मनुष्य की दुर्मति दूर होती है और सुमति आती है | मनुष्य के मन में आनेवाले बुरे विचार दूर हो जाते हैं, मनुष्य की बुरी आदतें छूट जाती है | वह सद्विचारों का आश्रय लेता है | उसका स्वभाव अच्छा होने लगता है | उसकी बुद्धि अच्छे और बुरे का सही तरीके से अंतर कर पाती है |

२) दोहे में दुर्मति और सुमति से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: मनुष्य को अच्छे या बुरे मार्ग पर ले जाने के लिए जिम्मेदार होता है उसका मन और उसकी बुद्धि | यदि यह दोनों उसे सही मार्ग दिखाए, उसे अच्छे और बुरे का भेद बताये और अच्छे रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करे तो वो मन और बुद्धि सुमति है | इसके विपरीत यदि मन हमेशा गलत हरकतों की ओर ही आकर्षित हो, बुद्धि हमेशा उन गलत हरकतों को सही ठहराती हो तो वो मन और बुद्धि दुर्मति कहलाती है |

३) निंदक को अपने पास क्यों रखना चाहिए ? अथवा
निंदक हमारी कमियाँ किस प्रकार दूर करता है ? अथवा
निंदक को पास रखने से क्या लाभ होता है ?
उत्तर: कबीरदासजी के अनुसार मनुष्य को अपनी निंदा करने वाले व्यक्ति को हमेशा अपने पास रखना चाहिए | क्रोध में आकर उससे लड़ाई नहीं करनी चाहिए | निंदा करने वाला व्यक्ति हमें हमारी गलतियाँ बताता रहता है | वह हममें गलतियाँ खोज-खोज के निकालता है | उसकी बातों को ध्यान से सुनना चाहिए | यदि हम में वो गलतियाँ हैं तो उन गलतियों को तुरंत दूर कर लेना चाहिए | इससे हमारे अंदर जो कमियाँ हैं, जो बुराइयाँ हैं वो दूर हो जायेंगी | कबीरदासजी इसलिए कहते हैं कि निंदक व्यक्ति बिना साबुन और पानी का प्रयोग किये हमारी कमियों को दूर करने में सहायता करता है और हमें निर्मल बनाता है |

४) निंदक से कबीरदासजी का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: कुछ व्यक्तियों के स्वभाव में होता है कि वो हमेशा दूसरों की गलतियाँ ही निकालते रहते हैं | दूसरों की बुराई करने में उन्हें बड़ा आनंद आता है | ऐसे लोगों को कोई पसंद नहीं करता | इनसे लोग दूर ही रहते हैं | कबीरदासजी ऐसे लोगों को निंदक कहते हैं | कबीरदासजी यह सुझाव भी देते हैं कि मनुष्य को निंदक व्यक्ति को हमेशा पास रखना चाहिए क्योंकि इससे हमें अपनी गलतियाँ पता चलती है |

ख) ऐसी वाणी बोलिए ……………………………….. दुनियाँ देखे नाहि |
१) कवि का परिचय दो | अथवा कबीरदासजी किस भक्तिधारा के कवि थे ? उनके विषय में एक अनुच्छेद लिखिए | (ICSE 2014)
उत्तर: प्रस्तुत दोहे संत कबीरदासजी द्वारा रचित हैं | कबीरदासजी अपने समय के प्रसिद्द एवं उच्च कोटि के संत थे | वे निर्गुण भक्तिधारा के कवि थे | वे पढ़े-लिखे नहीं थे परंतु उनका व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था | वे कवि, भक्त, महात्मा, समाज सुधारक थे | उनकी रचनाएँ तीन प्रकार की है, ‘साखी’, सबद, और ‘रमैनी’ | साखी दोहों में लिखी गयी है | इनमें सदाचार, संतोष, सत्संगति, प्रभु-स्मरण, आदि पर विशेष बल दिया जाता है | इनकी रचनाओं में ब्रज, अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी और पंजाबी के शब्दों का काफी प्रयोग हुआ है |

२) मनुष्य की वाणी कैसी होनी चाहिए ?
उत्तर: मनुष्य की वाणी हमेशा मीठी होनी चाहिए | उसे ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो सबको प्रिय लगे | सुननेवाले का मन प्रसन्न हो जाए, व स्वयं को भी बोलते हुए अच्छा लगे | मनुष्य की वाणी में सत्य, मधुरता व परहित ये तीन गुण होने चाहिए | उसे कटु वचन बोलने से हमेशा बचना चाहिए |

३) ‘कस्तूरी कुंडलि बसे’ इस दोहे से कबीरदासजी मनुष्य की किस अज्ञानता की ओर संकेत कर रहे हैं ?
उत्तर: कस्तूरी हिरण की नाभी में होता है | उसकी गंध से आकर्षित होकर हिरण उसे पूरे जंगल में खोजता फिरता है लेकिन उसे कस्तूरी कभी नहीं मिलता क्योंकि कस्तूरी पहले से उसके पास है | उस ओर उसका ध्यान नहीं जाता | मनुष्य भी उसी प्रकार ईश्वर को मंदिर, मस्जिद तथा तीर्थों में खोजता फिरता है लेकिन उसे ईश्वर के दर्शन नहीं होते | मनुष्य का इस ओर कभी ध्यान नहीं जाता कि संसार की प्रत्येक वस्तु में ईश्वर है, वह उसे अपने ह्रदय में ही पा सकता है | उसे कहीं खोजने की जरुरत नहीं | अपनी अज्ञानता के कारण ही वह ईश्वर को देख नहीं पा रहा है |

४) दुनिया राम को क्यों नहीं देख पा रही ?
उत्तर: मनुष्य राम को अर्थात ईश्वर को मंदिर, मस्जिद तथा तीर्थों में खोजता फिरता है | वह इस ओर ध्यान नहीं देता कि राम तो संसार के कण-कण में है | उन्हें तो मनुष्य अपने ह्रदय में ही पा सकता है | बस अपने ह्रदय को निर्मल बनाने की जरुरत है | उसके बाद राम को कहीं खोजने जाने की जरुरत नहीं | मनुष्य अपने ह्रदय को निर्मल नहीं करता व राम को बाहर संसार में खोजता है | इसलिए बहुत प्रयत्न करने पर भी दुनिया राम को नहीं देख पा रही है |

ग) कबिरा गरब न कीजिये ……………………………………….. पीर घनेरी होय |
१) मनुष्य को गर्व क्यों नहीं करना चाहिए ?
उत्तर: मनुष्य को कभी भी गर्व नहीं करना चाहिए क्योंकि हमारी सारी उपलब्धि, सारा धन, प्रभाव, वैभव सब कुछ क्षणों का है | मृत्यु एक ही क्षण में हमें समाप्त कर देगी और यह सब कुछ नहीं बचेगा | हम सब मृत्यु के दास हैं | कुछ समय के लिए हम कोई बड़ी उपलब्धि प्राप्त कर भी लेते हैं तो भी हमें उस पर बिलकुल भी अभिमान नहीं होना चाहिए |

२) काल की शक्ति का कबीरदासजी ने क्या वर्णन किया है ?
उत्तर: कबीरदासजी के अनुसार काल ने हमारा केश पकड़ा हुआ है अर्थात हम सब मृत्यु के हाथ में है | पता नहीं वह हमें कब और कहाँ मार देगा | चाहे हम देश में हो या परदेश में | मनुष्य चाहे धनी हो या निर्धन, कमजोर हो या शक्तिशाली, बालक हो या वृद्ध, मृत्यु कभी क्षण भर के लिए भी दया नहीं करती | इस प्रकार कबीरदासजी बता रहे हैं कि काल की शक्ति के आगे यह संसार क्षण भंगुर है |

३) ‘तिनका’ शब्द कबीरदासजी किस अर्थ में प्रयोग कर रहे हैं ?
उत्तर: कबीरदासजी ने दोहे में ‘तिनका’ शब्द गरीब तथा कमजोर लोगों के लिए प्रयोग किया है | संपन्न और प्रभावशाली व्यक्ति ऐसे लोगों को छोटा समझकर उनका अपमान, उनकी निंदा करते रहते हैं | कबीरदासजी ऐसा न करने का सुझाव दे रहे हैं क्योंकि समय आनेपर छोटे समझे जानेवाले लोग भी बड़ी हानि पहुँचा सकते हैं |

४) कमजोर तथा छोटे लोगों का अपमान क्यों नहीं करना चाहिए ? अथवा
तिनके की घोर पीड़ा देने की शक्ति क्या दर्शाती है ?
उत्तर: घास का तिनका दिखने में तो बहुत छोटा तथा मामूली दिखता है पर यदि वो किसी की आँख में चला जाए तो उसे बहुत कष्ट देता है | तिनके की पीड़ा देने की शक्ति मनुष्य को इस बात का संकेत देती है कि कमजोर तथा छोटे समझे जानेवाले लोग भी समय पड़ने पर बहुत हानि पहुँचा सकते हैं | समय कब कैसी परिस्थिति उत्पन्न कर दे इसका कोई अंदाजा नहीं | इसलिए अहंकार में आकर कमजोर तथा छोटे लोगों का अपमान कभी नहीं करना चाहिए |

अतिरिक्त प्रश्न
१) मनुष्य की वाणी उसे कई लोगों का मित्र बना सकती है तो कई लोगों का शत्रु | इसपर अपने विचार लिखिए |
उत्तर: मनुष्य की वाणी का बड़ा महत्व है | लोग किसी के अच्छे या बुरे होने का निर्णय इस आधार पर ले लेते हैं कि उसकी वाणी कैसी है ? क्या वह सबको प्रिय लगनेवाली मधुकर व हितकारी वाणी बोलता है या उसकी वाणी में कटुता होती है | प्रिय लगनेवाली व हितकारी वाणी बोलनेवाले व्यक्ति के अनेक मित्र बन जाते हैं | वह सबका प्रिय होता है | इसके विपरीत कटु वाणी बोलने वाला व्यक्ति सबसे शत्रुता ले बैठता है | उसे कोई पसंद नहीं करता | इसलिए मनुष्य को हमेशा अपनी वाणी का सही तरीके से प्रयोग करना चाहिए |

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