निर्माण (Nirman)

कवि: हरिवंशराय ‘बच्चन’

क) नीड़ का निर्माण फिर-फिर ………………………………… मोहिनी मुस्कान फिर-फिर !
१) प्रस्तुत पद्य खंड किस रचना से लिया गया है ? कवि का परिचय दो |
उत्तर: प्रस्तुत पद्यखंड श्री हरिवंशराय ‘बच्चन’ के सतरंगिनी नामक काव्य से लिया गया है | ‘बच्चन’ व्यक्ति-प्रधान गीतों के कवि हैं | इस क्षेत्र में इन्होनें विविध प्रयोग किये हैं | इनके गीतों की भाषा सरस और स्वाभाविक है | ‘मधुशाला’, ‘एकांत संगीत’, ‘आकुल अंतर’, ‘निशा निमंत्रण’, ‘सतरंगिनी’ इत्यादि इनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं | इनकी काव्य रचना ‘दो चट्टानों’ पर इन्हें साहित्य अकादमी की ओर से पुरस्कार प्रदान किया गया | सन् १९७६ में इन्हें पद्मभूषण की उपाधि से अलंकृत किया गया |

२) “नीड़ का निर्माण फिर-फिर” इन शब्दों द्वारा कवि क्या कहना चाहते हैं ?
उत्तर: “नीड़ का निर्माण फिर-फिर” इन शब्दों द्वारा कवि मनुष्य को लगातार पुरुषार्थ करने व भविष्य के प्रति आशावान बने रहने के लिए कह रहे हैं | पक्षी जब अपने लिए घोसला बनाने का प्रयत्न करते हैं तो कई बार विभिन्न कारणों से वो घोसले नष्ट हो जाते हैं | इसके बावजूद वो पक्षी प्रयत्न करना नहीं छोड़ते | बार- बार कोशिश करके घोसला बना ही लेते हैं | नीड़ को प्रतीक के रूप में प्रयोग करके कवि यह कह रहे हैं कि मनुष्य जब कोई चीज करने या पाने की कोशिश करता है तो बीच में कई रुकावटें आती हैं | मनुष्य को उन रुकावटों से डरकर या परेशान होकर अपने लक्ष्य को छोड़ना नहीं चाहिए, बल्कि बार-बार प्रयत्न करते रहना चाहिए |

३) आँधी के उठने पर क्या हुआ ?
उत्तर: आँधी के उठने पर आसमान में अँधेरा छा गया | धूल से भरे हुए बादलों ने धरती को चारों तरफ से घेर लिया | दिन में भी रात जैसा अँधकार हो गया | उस रात अन्य रात्रियों से ज्यादा अँधकार छा गया | ऐसा लग रहा था कि अब दोबारा इस संसार में सुबह नहीं होगा | इस अँधेरी रात से पूरा संसार डर गया |

४) आँधी यहाँ किस बात का प्रतीक है ? उसके द्वारा कवि क्या कहना चाहते हैं ?
उत्तर: कवि मनुष्य जीवन में आनेवाले दुखों तथा संकटों के बारे में बताने के लिए आँधी को एक प्रतीक के रूप में प्रयोग कर रहे हैं | कवि कह रहे हैं कि मनुष्य जीवन में कई बार घनघोर दुख तथा संकट आ जाते हैं | ऐसा लगता है वे मनुष्य को पूरी तरह समाप्त कर देंगे | मनुष्य का आत्मविश्वास डगमगा जाता है, वह सोचने लगता है कि यह दुख तथा संकट कभी समाप्त ही नहीं होंगे | इन से पार पाने का कोई उपाय नहीं है |
५) ऐसा क्यों लग रहा था कि अब कभी सवेरा नहीं होगा ? यहाँ सवेरे से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: आँधी ने पूरे आसमान को इस तरह से ढँक दिया था कि दिन में भी रात जैसा अँधेरा हो गया था | रात तो इतनी ज्यादा अँधकारमय थी कि ऐसा लगता था जैसे अब कभी सुबह नहीं होगी | यहाँ अँधेरा संकटों तथा दुखों का प्रतीक है और सवेरा उन संकटों तथा दुखों के समाप्त होने की आशा है | कवि कह रहे हैं कि यह दुख इतना बड़ा है कि लगता है वो कभी समाप्त ही नहीं होगा |

६) उषा की मोहिनी मुस्कान से कवि का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: उषा की मोहिनी मुस्कान से कवि का तात्पर्य उम्मीदों की किरण से है | जिस तरह रात कितनी भी अँधेरी हो, सुबह होते ही सूर्य की किरणें उस अँधकार को दूर कर देती हैं | उसी तरह मुसीबतों तथा दुखों के बादल कितने भी बड़े हों, एक समय बाद भाग्य मनुष्य को ऐसा अवसर जरुर देता है कि वह पुरुषार्थ करके उन दुखों के पहाड़ों को हटा सके |

७) पूरा संसार क्यों भयभीत था ?
उत्तर: इतनी अँधेरी रात आयी थी कि ऐसा लगा जैसे कभी सवेरा होगा ही नहीं | इस भयानक रात्रि से सारा संसार भयभीत हो गया | अर्थात जीवन में इतने बड़े-बड़े दुख तथा संकट आये कि मनुष्य उनसे भयभीत हो गया और उसे लगा कि ये दुख तथा संकटों के बादल कभी दूर नहीं होंगे |

ख) वह चले झोंके कि काँपे ………………………………. गर्व से निज तान फिर-फिर !
१) आँधियों ने किस तरह की तबाही मचाई ?
उत्तर: आँधियों में इतनी तेज हवाएँ चली कि बड़े-बड़े पहाड़ भी काँपने लगे | विशालकाय पेड़ जड़ के साथ उखड़कर गिर गए | कंकड़, ईट, पत्थर से बने सारे महल तथा घर डगमगाने लगे | पक्षिओं के घोंसले पूरी तरह बर्बाद हो गए | आँधियों ने इस तरह प्रकृति में भयानक तबाही मचाई |

२) भीम कायावान भूधर के काँपने से कवि का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: भीम कायावान भूधर का अर्थ होता है विशालकाय पहाड़ | यहाँ कवि ने विशालकाय पहाड़ों को समर्थ तथा धनी व्यक्तियों के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया है | इतनी भयानक आँधी चली कि भीम कायावान भूधर भी काँपने लगे, अर्थात संकट इतना बड़ा था कि बड़े-बड़े समर्थ लोग, धनी लोग भी डर के मारे काँपने लगे | उनमें भी संकट का सामना करने की हिम्मत नहीं थी |

३) तिनकों से विनिर्मित घोंसलों पर क्या मुसीबत आयी ? कवि इस उदाहरण द्वारा क्या बताना चाहते हैं ?
उत्तर: आँधी इतनी भयानक थी कि बड़े-बड़े पहाड़ हिल गए, विशालकाय पेड़ जड़ों से उखड गए, कंकड़-पत्थरों से बने महल तथा घर भी डगमगा गए | ऐसी आँधी में तिनकों से बने घोंसले कहाँ टिक सकते थे | वे भी पूरी तरह बर्बाद हो गए | कवि इस उदाहरण द्वारा ये बताना चाहते हैं कि जीवन में कभी-कभी इतने बड़े संकट आ जाते हैं कि समर्थ तथा धनी व्यक्ति भी टिक नहीं पाते, तो सामान्य मनुष्य उनका सामना कैसे कर पायेगा ? वे भी पूरी तरह बर्बाद हो जाते हैं |

४) आशा का विहंगम मनुष्य को क्या प्रेरणा देता है ?
उत्तर: आँधी तथा तूफान अनगिनत बार पक्षिओं के घोंसलों को नष्ट कर देते हैं, किंतु वो पक्षी कभी हार नहीं मानते | बार-बार अपना घोंसला बनाते रहते हैं | आशा का विहंगम मनुष्य को इसी बात की प्रेरणा दे रहा है कि संकट कितना भी बड़ा हो, विनाश कितना भी भयंकर हो, निर्माण की प्रक्रिया उसके बाद दुबारा शुरू की जा सकती है | मनुष्य को किसी भी हालत में आशावान बने रहना चाहिए |

ग) क्रुद्ध नभ के वज्रदंतों ……………………………….. सृष्टि का आह्वान फिर-फिर |
१) क्रुद्ध नभ के वज्रदंतों में उषा के मुस्कराने से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: चाहे कितनी भी अँधेरी रात हो सुबह प्रकाश की किरणें उस अँधकार को छिन्न-भिन्न कर देती है | प्रकृति के इसी घटनाक्रम को काव्य रूप में लिखते हुए कवि कहते हैं कि क्रुद्ध नभ के वज्रदंतों में उषा मुस्कराती है | कवि इस उदाहरण द्वारा यह बताना चाहते हैं कि परिस्थितियाँ कितनी भी प्रतिकूल हों, उम्मीद की किरण हमेशा उन पर विजय प्राप्त करती है |

२) घोर गर्जनमय गगन में खग-पंक्ति के गाने का क्या अर्थ है ?
उत्तर: आकाश में काले बादल जब आपस में टकराते हैं तो भीषण गर्जना होती है | यह गर्जना इतनी भयंकर होती है कि उस समय कोई और आवाज सुनाई नहीं देती | ऐसे समय में भी पक्षी कतार में उड़ते हैं, चहचहाते हैं | कवि इस उदाहरण द्वारा यह बताना चाहते हैं कि परिस्थितियाँ कितनी भी प्रतिकूल हों, मनुष्य को उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए | लगातार प्रयत्न करते रहना चाहिए |

३) चिड़िया किस प्रकार ‘पवन उनचास’ को नीचा दिखाती है? यहाँ ‘पवन उनचास’ से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: ऋग्वेद में पवन के उनचास देवता हैं | इसलिए कवि ने वायु के लिए ‘पवन उनचास’ का प्रयोग किया है | ये पवन बहुत प्रबल होते हैं | अपने वेग के साथ सब कुछ उड़ा ले जाते हैं | ऐसे में भी चिड़िया अपनी चोंच में तिनका लिए हवा के रुख के विपरीत उड़ती जाती है | इसलिए कवि ने लिखा है कि चिड़िया ‘पवन उनचास’ को नीचा दिखाती है |

४) निर्माण के सुख को नाश के दुःख से क्यों नहीं दबाया जा सकता ?
उत्तर: नाश का दुःख कितना भी बड़ा हो, वह हमेशा के लिए नहीं टिक सकता | उसका अंत होना ही है | निर्माण की प्रकिया दुबारा शुरू होना निश्चित है | कवि ने इस बात को स्पष्ट करने के लिए उषा तथा चिड़िया का उदाहरण दिया है | रात चाहे कितनी भी अँधेरी हो, उषा की किरणें उस अँधेरे को छिन्न-भिन्न कर देती हैं | पवन कितने भी वेग से बहे, चिड़िया उसके विपरीत दिशा में उड़ान भरती ही है | विनाश कितना भी भयंकर हो, उसके बाद सृष्टि में नवनिर्माण शुरू होता ही है | इसलिए कवि कहते हैं कि निर्माण के सुख को नाश के दुःख से नहीं दबाया जा सकता |

५) कवि को इस बात का विश्वास क्यों है कि प्रलय की निस्तब्धता के बाद सृष्टि का नवगान शुरू होगा ?
उत्तर: कवि का मानना है कि नाश का दुःख चाहे कितना भी बड़ा हो, उसका अंत होना ही है | वह कभी भी निर्माण के सुख को दबा नहीं सकती | कवि ने यह बात स्पष्ट करने के लिए प्रकृति में घटनेवाली कई घटनाओं का उदाहरण दिया है | आँधी तथा तूफान कितनी भी बार चिड़ियों के घोंसलों को नष्ट करें, वो दुबारा घोंसला बनाती है | रात कितनी भी अँधेरी हो, सुबह की किरण उस अँधेरे को दूर कर देती है | हवा कितने भी वेग से बहे, एक नन्ही सी चिड़िया उसके विपरीत दिशा में उड़ान लगा लेती है | इसलिए कवि को पूरा विश्वास है कि विनाशलीला कितनी भी भयंकर हो, उसके बाद उम्मीद की किरण होती ही है | यदि पूरे संसार में प्रलय आ भी जाए तो उसके बाद भी सृष्टि की पुनर्रचना अवश्य होगी |

• प्रस्तुत कविता से क्या संदेश मिलता है ?
उत्तर: प्रस्तुत कविता द्वारा कवि हरिवंशराय ‘बच्चन’ मनुष्य को लगातार पुरुषार्थ करने व भविष्य के प्रति आशावान बने रहने का संदेश दे रहे हैं | संकट चाहे कितना भी बड़ा हो, मनुष्य अपने प्रयत्न द्वारा उस संकट को दूर कर सकता है | हो सकता है संकट इतना भयंकर हो कि मनुष्य का सब कुछ बरबाद हो जाए | उसकी सारी मेहनत पर पानी फिर जाए | भाग्य उसका साथ न दे | ऐसी हालत में भी मनुष्य को पुरुषार्थ करना नहीं छोड़ना चाहिए | अपने बार-बार के प्रयत्नों द्वारा उसको संकटों पर विजय पाना चाहिए | किस्मत उसके सतत प्रयासों से प्रसन्न होकर उसे सफलता अवश्य दिलाएगी |

केंद्रीय भाव :
प्रस्तुत कविता में कवि हरिवंशराय ‘बच्चन’ मनुष्य को लगातार पुरुषार्थ करने व भविष्य के प्रति आशावान बने रहने की प्रेरणा दे रहे हैं | संकट चाहे कितना भी बड़ा हो, मनुष्य अपने प्रयत्न द्वारा उस संकट को दूर कर सकता है | कवि ने इसके लिए प्रकृति में घटनेवाली कई घटनाओं का उदाहरण दिया है | आँधी तथा तूफान कितनी भी बार चिड़ियों के घोंसलों को नष्ट करें, वो दुबारा घोंसला बना लेती ही है | रात कितनी भी अँधेरी हो, सुबह की किरणें उस अँधेरे को दूर कर देती है | हवा कितने भी वेग से बहे, एक नन्ही सी चिड़िया उसके विपरीत दिशा में उड़ान लगा लेती है | मनुष्य को भी अपने पुरुषार्थ तथा भाग्य पर भरोसा रखना चाहिए | किस्मत भले ही कुछ समय के लिए साथ न दे, किंतु सतत प्रयत्न करते रहने से भाग्य चमकता ही है |

अतिरिक्त प्रश्न
१) प्रस्तुत कविता किस रचना से ली गयी है ? कवि ने किस परिस्थिति में यह कविता लिखी ?
उत्तर: प्रस्तुत कविता हरिवंशराय ‘बच्चन’ जी की रचना ‘सतरंगिनी’ से ली गयी है | इस कविता की रचना उन्होंने अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद की थी | दुःख तथा विषाद की सघन घटाओं के बीच कवि को प्रकाश की किरण दिखाई दी थी और वह गा उठा – ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ |

२) समय बदलता रहता है | अच्छे के बाद बुरा दिन तथा बुरे के बाद अच्छा दिन आता रहता है | इस विषय पर अपने विचार लिखिए |
उत्तर: मनुष्य जीवन में कभी अनुकूलता तो कभी प्रतिकूलता आती रहती है | कई बार परिस्थितियाँ बिलकुल हमारे पक्ष में हो जाती हैं तो कई बार बिलकुल विरोध में | समय परिवर्तनशील है | इसलिए कहा जाता है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है | जो मनुष्य इस बात को समझता है वो बुरे वक्त में घबराता नहीं है | वह प्रतीक्षा करता है अनुकूल समय की | उसे पता है कि आया हुआ संकट दूर अवश्य होगा | वह धैर्य के साथ संकट का सामना करता है | ऐसे मनुष्य ही आए हुए अवसरों का लाभ उठा पाते हैं |

३) प्रस्तुत कविता के द्वारा कवि ने मानव को कौन सा दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा दी है और क्यों ? (ICSE 2009)
उत्तर: इस कविता के माध्यम से कवि यह प्रेरणा देना चाहता है कि दुखी और निराश जीवन में भी मनुष्य को जीने की आशा सदैव रखनी चाहिए | यदि नीड़ बिखर भी जाए तो उसे फिर नए सिरे से बनाने का प्रयास करना चाहिए | मनुष्य को सदैव आशावान प्रवृत्ति का होना चाहिए | इस प्रकार विनाश के दुःख से निर्माण का सुख ज्यादा श्रेयस्कर होता है |

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