मेरे मास्टर साहब (Mere master sahab)

लेखक: चंद्रगुप्त विद्यालंकार

क) आज मैं एक बहुत प्रतिष्ठित कॉलेज का प्रिंसिपल हूँ | मेरी गंजी खोपड़ी की यहाँ बहुत धाक है |
१) उपर्युक्त अवतरण का प्रसंग लिखिए |
उत्तर: लेखक की काफी उम्र हो चुकी है | उनके मन में अपने बाल्य काल की बहुत सारी यादें हैं, जब वह एक साधारण से विद्यार्थी थे | कक्षा के सहपाठी उन्हें बहुत चिढ़ाया करते थे | कुछ साथियों का स्मरण करके तो लेखक आज भी काँप उठते हैं | विद्यार्थी काल में मास्टर साहब ही उनको बचाते थे | किंतु अब परिस्थिति पूरी तरह बदल चुकी है | आज वे एक बहुत प्रतिष्ठित कॉलेज के प्रिंसिपल हैं | उनकी विद्वता की धाक पूरे कॉलेज में है |

२) कौन प्रिंसिपल है ? उसका संक्षिप्त परिचय दें |
उत्तर: कहानी के लेखक एक प्रतिष्ठित कॉलेज के प्रिंसिपल है | उनका नाम विनायक है | वह अब बूढ़े हो चुके हैं | उनकी गंजी खोपड़ी की धाक पूरे कॉलेज में है | उनकी विद्वता तथा मौलिकता पर कॉलेज के विद्यार्थी तथा अध्यापक गर्व करते हैं | वो अपने बाल्य काल के शिक्षकों का बहुत सम्मान करते हैं | उनके जीवन में उनके भूगोल के शिक्षक मास्टर साहब का महत्वपूर्ण स्थान है |

३) गंजी खोपड़ी की धाक किस कारण है ?
उत्तर: लेखक एक प्रतिष्ठित कॉलेज के प्रिसिपल है | उन्होंने प्रथम श्रेणी में एम. ए. पास किया है | उन्हें उनके विषय का प्रगाढ़ ज्ञान है | उनकी विद्वता तथा मौलिकता पर सारे विद्यार्थी तथा अध्यापक बहुत गर्व करते हैं | विषय के ज्ञान तथा कठोर अनुशासन के कारण उनकी गंजी खोपड़ी की बहुत धाक है |

४) गंजी खोपड़ी वाला किस भय से सहर उठता है ?
उत्तर: यहाँ गंजी खोपड़ी वाले से तात्पर्य लेखक से है जो अब एक प्रतिष्ठित कॉलेज का प्रिंसिपल है | लेखक जब अपने बाल्य काल का स्मरण करता है तो उसे अपने कुछ साथिओं का स्मरण हो जाता है | वो लेखक को बहुत चिढ़ाया करते थे, बहुत परेशान करते थे | मौका मिलने पर वे लेखक को मार कर भाग भी जाया करते थे | लेखक को वो चूहा कह कर चिढ़ाते थे | लेखक को अब भी उनका स्मरण आता है तो वो सहर उठता है |

ख) बदकिस्मती से मेरे माँ-बाप ने जिस स्कूल में भर्ती किया, उसमें बहुत शीघ्र मेरे नाम के साथ ‘चूहा’ विशेषण जुड़ गया |
१) किसके नाम की चर्चा की गई है ?
उत्तर: यहाँ लेखक के नाम की चर्चा की गई है | उनका नाम विनायक है | गणित के मास्टर ने लेखक की चंचलता देखकर एक बार उन्हें चूहा नाम से बुलाया था | छोटे कद, तेज चाल, तथा चमकीली आँखों के कारण, शीघ्र पूरे स्कूल में उनका नाम ‘विनायक चूहा’ प्रसिद्ध हो गया |

२) ‘चूहा’ विशेषण जुड़ने का क्या कारण था ?
उत्तर: लेखक के माता पिता ने जिस स्कूल में लेखक को भर्ती किया था, वहाँ बहुत शीघ्र उनके नाम के आगे चूहा जुड़ गया | सबसे पहले गणित के मास्टर ने लेखक की चंचलता देखकर उन्हें चूहा नाम से बुलाया था | छोटे कद, तेज चाल, तथा चमकीली आँखों के कारण, बहुत शीघ्र पूरे स्कूल में उनका नाम ‘विनायक चूहा’ प्रसिद्ध हो गया | शिक्षक भी लेखक को इसी नाम से बुलाते थे | धीरे-धीरे लोगों ने विनायक शब्द भी छोड़ दिया, लेखक को सिर्फ चूहा कह कर ही बुलाने लगे |
३) ‘चूहा’ उपनाम किसने दिया और उसका क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर: सबसे पहले गणित के मास्टर ने लेखक की चंचलता देखकर उन्हें चूहा नाम से बुलाया था | छोटे कद, तेज चाल, तथा चमकीली आँखों के कारण, बहुत शीघ्र पूरे स्कूल में उनका नाम ‘विनायक चूहा’ प्रसिद्ध हो गया | शिक्षक भी लेखक को इसी नाम से बुलाते थे | धीरे-धीरे लोगों ने विनायक शब्द भी छोड़ दिया, लेखक को सिर्फ चूहा कह कर ही बुलाने लगे | लेखक का हँसना दूभर हो गया था | किसी से जरा सा कुछ कहते ही वो चूहा कह कर चिढ़ा देता | शरारती लड़के लेखक को मारकर भाग जाते, लेखक यदि किसी शिक्षक से शिकायत करता तो वो झट से आकर कह देते ‘नहीं जी, पहले चूहे ने ही मुझे काट खाया था |’ इस छेड़ से खिन्न होकर लेखक रोने लगता | शिक्षकों को ऐसा लगता कि शरारत लेखक ने ही शुरू की थी |

४) ‘चूहा’ उपनाम में क्या परिवर्तन हुआ और कैसे ?
उत्तर: सबसे पहले गणित के मास्टर ने लेखक की चंचलता देखकर उन्हें चूहा नाम से बुलाया था | छोटे कद, तेज चाल, तथा चमकीली आँखों के कारण, बहुत शीघ्र पूरे स्कूल में उनका नाम ‘विनायक चूहा’ प्रसिद्ध हो गया | शिक्षक भी लेखक को इसी नाम से बुलाते थे | धीरे-धीरे लोगों ने विनायक शब्द भी छोड़ दिया, लेखक को सिर्फ चूहा कह कर ही बुलाने लगे | लेखक का हँसना दूभर हो गया था | किसी से जरा सा कुछ कहते ही वो चूहा कह कर चिढ़ा देता | शरारती लड़के लेखक को मारकर भाग जाते, लेखक यदि किसी शिक्षक से शिकायत करता तो वो झट से आकर कह देते ‘नहीं जी, पहले चूहे ने ही मुझे काट खाया था |’ इस छेड़ से खिन्न होकर लेखक रोने लगता | शिक्षकों को ऐसा लगता कि शरारत लेखक ने ही शुरू की थी |

ग) मास्टर साहब भूगोल के अध्यापक थे | वे केवल उर्दू का मिडिल ही पास थे, परंतु उन दिनों में हम उन्हें संसार के सबसे बड़े विद्वानों में से एक समझा करते थे |
१) उपर्युक्त गद्यांश का प्रसंग लिखिए |
उत्तर: लेखक अपने बचपन के कई प्रसंग बता रहे हैं जब वो एक सामान्य विद्यार्थी थे | उस समय उनके जीवन पर जिस एक व्यक्ति का बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा था वो थे मास्टर साहब | उनका लेखक पर बहुत ज्यादा स्नेह था | वे भूगोल के अध्यापक थे | वे केवल उर्दू का मिडिल ही पास थे, परंतु उन दिनों में विद्यार्थी उन्हें संसार के सबसे बड़े विद्वानों में से एक समझा करते थे | जिस विद्वत्ता से वे बिजनौर जिले का भूगोल पढ़ाया करते थे, सारी जमात उसकी कायल थी |

२) मास्टर साहब की विशेषताएँ बताइए |
उत्तर: मास्टर साहब भूगोल के अध्यापक थे | वे केवल उर्दू का मिडिल ही पास थे, परंतु उन दिनों में विद्यार्थी उन्हें संसार के सबसे बड़े विद्वानों में से एक समझा करते थे | जिस विद्वत्ता से वे बिजनौर जिले का भूगोल पढ़ाया करते थे, सारी जमात उसकी कायल थी | वे आर्थिक दृष्टी से बहुत गरीब थे | सिर्फ २५ रुपये मासिक लेकर ही अपने बड़े परिवार का पालन पोषण करते थे | वह स्वभाव से बहुत उदार भी थे |

३) भूगोल की कक्षा में मॉनिटर का क्या प्रकरण था ?
उत्तर: लेखक भूगोल में अपने जमात में पहला रहता था | इस वजह से मास्टर साहब ने उसे क्लास का मॉनिटर बना रखा था | लेखक पढाई में अच्छा होते हुए भी अपनी जमात का मॉनिटर नहीं था | जमात का असली मॉनिटर लेखक से बहुत चिढ़ता था | वह हमेशा लेखक को पिटवाने का प्रयत्न करता था | इसलिए लेखक हमेशा भूगोल की कक्षा की प्रतीक्षा किया करता था | वहाँ मॉनिटर का अधिकार प्राप्त कर वो जमात के मॉनिटर से बदला निकालने का पूरा प्रयत्न करता |

४) लेखक असली मॉनिटर को कैसे तंग करता था और क्यों ?
उत्तर: लेखक भूगोल में अपने जमात में पहला रहता था | इस वजह से मास्टर साहब ने उसे क्लास का मॉनिटर बना रखा था | लेखक पढाई में अच्छा होते हुए भी अपनी जमात का मॉनिटर नहीं था | जमात का असली मॉनिटर लेखक से बहुत चिढ़ता था | वह हमेशा लेखक को पिटवाने का प्रयत्न करता था | इसलिए लेखक हमेशा भूगोल की कक्षा की प्रतीक्षा किया करता था | वहाँ मॉनिटर का अधिकार प्राप्त कर वो जमात के मॉनिटर से बदला निकालने का पूरा प्रयत्न करता | वह पूरा दिमाग लगाकर मॉनिटर से कठिन से कठिन सवाल करता था, ताकि वह जवाब न दे सके | लेखक उसकी शिकायत मास्टर साहब से करता व असली मॉनिटर को डाँट को खिलाता | इस प्रकार लेखक असली मॉनिटर को तंग करता था |

घ) परंतु उनका यह अवगुण भी मेरे लिए बहुत लाभकर था |
१) यहाँ किसके और कौन से अवगुण की बात हो रही है ?
उत्तर: मास्टर साहब भूगोल के शिक्षक थे | अच्छा शिक्षक होने के साथ-साथ वो ह्रदय से बहुत उदार भी थे, किंतु उनमें एक अवगुण था | वह स्वभाव से ही बहुत आलसी थे | वे सदा क्लास में देर से आते थे और घंटा बज चुकने पर भी देर तक पढ़ाते रहते थे |

२) मास्टर साहब के अवगुण का लेखक को क्या लाभ होता ?
उत्तर: मास्टर साहब एक अच्छे शिक्षक तथा ह्रदय से उदार व्यक्ति थे किंतु उनमें एक अवगुण भी था | वो स्वभाव से ही बहुत आलसी थे | वे सदा क्लास में देर से आते थे और घंटा बज चुकने पर भी देर तक पढ़ाते रहते थे | लेखक को उनके इस अवगुण के कारण लाभ होता क्योंकि वो भूगोल की कक्षा का मॉनिटर था | जब तक मास्टर साहब क्लास में न आते, लेखक ही मॉनिटर के अधिकार से क्लास का निरिक्षण किया करता था | वह एक लंबा प्वाइंटर हाथ में लेकर लड़कों को परेशान करता | इस तरह लेखक को सहपाठियों पर शासन का मौका मिल जाता |

३) लेखक का भूगोल की कक्षा का आनंद ज्यादा दिन क्यों नहीं चला ?
उत्तर: मास्टर साहब जो कि भूगोल की कक्षा के शिक्षक थे, वो कक्षा में ज्यादातर देरी से ही आते | जब तक मास्टर साहब क्लास में न आते, लेखक ही मॉनिटर के अधिकार से क्लास का निरिक्षण किया करता था | वह एक लंबा प्वाइंटर हाथ में लेकर लड़कों को परेशान करता, किंतु लड़कों की सूझ बहुत दूर तक पहुँचती है | उन्होंने लेखक का नाम चूहा तो रखा ही था प्वाइंटर का नाम चूहे की मूँछ रख दिया | बस ज्यों ही लेखक प्वाइंटर उठाकर बोर्ड के पास जाता, लडके आँख के इशारे से एक-दूसरे की ओर देखकर शरारत भरे ढंग से मुस्कराने लगते | लेखक इन गुप्त व्यंजनाओं से इतना तंग आ जाता कि रोने लगता | इस तरह लेखक का भूगोल की कक्षा का आनंद ज्यादा दिन नहीं चला |

४) मास्टर साहब क्रूरता के अवतार क्यों बन जाते ?
उत्तर: जब तक मास्टर साहब भूगोल की क्लास में न आते, लेखक ही मॉनिटर के अधिकार से क्लास का निरीक्षण किया करता था | वह एक लंबा प्वाइंटर हाथ में लेकर लड़कों को परेशान करता, किंतु लड़कों की सूझ बहुत दूर तक पहुँचती है | उन्होंने लेखक का नाम चूहा तो रखा ही था प्वाइंटर का नाम चूहे की मूँछ रख दिया | बस ज्यों ही लेखक प्वाइंटर उठाकर बोर्ड के पास जाता, लड़के आँख के इशारे से एक-दूसरे की ओर देखकर शरारत भरे ढंग से मुस्कराने लगते | लेखक इन गुप्त व्यंजनाओं से इतना तंग आ जाता कि रोने लगता | लेखक को रोता देख मास्टर साहब साक्षात क्रूरता का अवतार बन जाते |

ङ) मैं मुख्याध्यापक बनकर स्कूल में आया हूँ, स्कूल में मेरा बहुत प्रभाव है |
१) लेखक के मुख्याध्यापक बन कर आने का स्कूल के अनुशासन पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर: लेखक जिस स्कूल में बचपन में पढ़ते थे वहीं प्रधानाध्यापक बनकर आये थे, वहाँ उनका बहुत प्रभाव था | विद्यार्थी उनका बहुत सम्मान करते थे, अध्यापक उनके साथ अदब से पेश आते थे | लेखक बहुत शीघ्र ही कड़े नियंत्रण का पक्षपाती हेडमास्टर प्रसिद्ध हो गया | घंटा बजते ही सब लड़के स्कूल में पहुँच जाएँ, सब काम ठीक समय पर हो, लड़कों की वेशभूषा यथासंभव एक समान रहे, वे स्कूल में कभी शोर न करें, इन सब बातों पर लेखक बहुत अधिक ध्यान देता | लेखक के रौब के कारण सारे उस्ताद खड़े होकर अपनी जमातों को पढ़ाते |

२) लेखक के विद्यार्थी से मुख्याध्यापक बनने के दरम्यान स्कूल में क्या परिवर्तन आ गए थे ?
उत्तर: लेखक १०-१२ वर्ष बाद उसी स्कूल में वापस आया जहाँ वो विद्यार्थी था | इस बीच स्कूल में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका था | उन दिनों वह डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का साधारण मिडिल स्कूल था, अब वह सरकारी हाई स्कूल बन गया है | स्कूल की इमारतें भी पहले की अपेक्षा बहुत विस्तृत और सुंदर बना दी गयी हैं | सहन में एक सुंदर फुलवारी लग गयी है | मास्टर साहब को छोड़कर पुराने ज़माने का कोई अवशेष वहाँ नहीं था |

३) लेखक के मुख्याध्यापक बनकर विद्यालय में आने के बाद मास्टर साहब का उनके प्रति व्यवहार में क्या परिवर्तन आया ?
उत्तर: मास्टर साहब ने विद्यार्थी काल में लेखक से बड़ा प्रेमपूर्ण व्यवहार किया था | अब लेखक मुख्याध्यापक बनकर उसी स्कूल में वापस आये हैं | लेखक का पूरे स्कूल में रौब है | सारे अध्यापक उनसे अदब से पेश आते | मास्टर साहब भी उनसे डरते हुए ही पेश आते | यदि किसी वजह से लेखक के दफ्तर में जाना हो तो भी चपरासी से पूछ कर डरते-डरते आते | इस तरह लेखक मुख्याध्यापक के पद ने मास्टर साहब के उनके प्रति व्यवहार में परिवर्तन ला दिया |

४) लेखक की नियुक्ति से मास्टर साहब प्रसन्न तथा खिन्न दोनों क्यों थे ?
उत्तर: मास्टर साहब लेखक की प्रधानाध्यापक पद पर नियुक्ति से प्रसन्न तथा खिन्न दोनों थे | अपने विद्यार्थी की प्रगति देखकर एक शिक्षक के मन में जो प्रसन्नता होती है वो तो उनके मन में थी | किंतु खिन्न वो इसलिए थे कि अपनी लंबी जिन्दगी में उन्हें जिन-जिन हेडमास्टरों से पाला पड़ा है, वे सब कभी न कभी उनकी आलसी तबियत के कारण उन्हें फटकार अवश्य लगा चुके हैं | इस बुढ़ापे में मास्टर साहब का आलस्य और भी बढ़ गया है | परंतु अपने इस नए चेले हेडमास्टर के डर से उन्हें अपनी वह तबियत छोड़ने के लिए जी-जान से प्रयत्न करना पड़ रहा था |

च) दो-एक क्षण तक उनकी ओर देखते रहकर क्रोध भरे स्वर में मैंने पुकारा- “मास्टर साहब |”
१) लेखक क्रोध में भरकर दफ्तर से बाहर क्यों निकला ?
उत्तर: गर्मी का मौसम होने के कारण लेखक के दफ्तर में बड़ी तेज गरमी हो रही थी | लेखक की कोई काम करने की इच्छा नहीं हो रही थी | ऐसे में उसके दफ्तर के सामने स्कूल के सहन में एक पेड़ की छाया में किसी क्लास की पढाई हो रही थी, वहाँ लड़के शोर मचा रहे थे | इस शोर ने लेखक को और खिन्न कर दिया | लड़कों का शोर इतना बढ़ गया कि लेखक के लिए वह सहना असह्य हो गया | इसलिए वह क्रोध में दफ्तर से बाहर निकला ताकि उस शोर को शांत करा सके |

२) दफ्तर से बाहर आकर लेखक ने क्या दृश्य देखा?
उत्तर: लेखक शोर से परेशान होकर बाहर निकला तथा बाहर का दृश्य देखकर स्तब्ध रह गया | उसने देखा कि मास्टर साहब एक कुर्सी पर बैठे-बैठे ऊँघ रहे थे और उनके सामने घास पर बैठे हुए चौथी जमात के छोटे-छोटे बच्चे मनमाना व्यवहार कर रहे थे और शोर मचा रहे थे | कुछ लड़के आपस में हाथापाई भी कर रहे थे | अपने दफ्तर के ठीक सामने इस तरह के असभ्य व्यवहार को देखकर लेखक क्रोधित हो उठा |

३) क्रोद्ध में लेखक ने क्या किया ?
उत्तर: लेखक अपने दफ्तर में हो रही गर्मी से बहुत परेशान था | इतने में उसके दफ्तर के सामने ही मास्टर साहब के कक्षा के विद्यार्थी बहुत शोर कर रहे थे | लेखक उसके दफ्तर के सामने ही होनेवाले इस असभ्य बर्ताव के कारण क्रोधित हो उठा | वह शीघ्रता से मास्टर साहब के पास पहुँचा | सब लड़के मुख्याध्यापक को देखकर उठ खड़े हुए पर मास्टर साहब सो रहे थे | दो-एक क्षण तक उनकी तरफ देखकर कृद्ध भरे स्वर में लेखक ने पुकारा “मास्टर साहब” | इस तरह क्रोद्ध करने के बाद मास्टर साहब की अवस्था देखकर लेखक को अपने कार्य पर बहुत पछतावा हुआ |

४) लेखक की डाँट की वजह से मास्टर साहब की क्या अवस्था हुई ?
उत्तर: लेखक जब बच्चों द्वारा मचाये शोर से परेशान होकर अपने दफ्तर से बाहर निकला तो उसने देखा कि मास्टर साहब बच्चों को पढ़ाने के बजाय कुर्सी पर बैठे-बैठे सो रहे हैं | बच्चे शोर मचा रहे थे तथा आपस में हाथापाई कर रहे थे | लेखक इससे क्रोधित हो उठा व मास्टर साहब के पास जाकर पुकारा “मास्टर साहब” | मास्टर साहब तुरंत जाग गए जैसे किसी ने उनपर तमंचे से फायर कर दिया हो | वे हड़बड़ाकर एकदम कुर्सी से उठ खड़े हुए | उनका चेहरा अत्यधिक लज्जावनत हो गया | अपनी आँखें नीची कर वे जमीन की ओर ताकने लगे |

छ) इसके बाद उनके पैरों के पास बैठकर मैं धीरे-धीरे उनके पैर दबाने लगा |
१) लेखक भोजन क्यों नहीं कर पाया ?
उत्तर: लेखक ने क्रोद्ध में भरकर मास्टर साहब को डाँट दिया था, किंतु उसके बाद मास्टर साहब का लज्जान्वत चेहरा देखकर लेखक को बहुत दुख हुआ | उसका मन उदास हो गया | मास्टर साहब से इस तरह पेश आना पड़ेगा ऐसा लेखक ने कभी सोचा भी नहीं था | लेखक ने वहीं देख लिया था कि उसकी फटकार से मास्टर साहब को असह्य क्लेश पहुँचा है | लेखक को रह-रहकर मास्टर साहब का झुका हुआ, लज्जित तथा व्यथित चेहरा याद आ रहा था | इस मानसिक खेद के कारण लेखक भोजन नहीं कर पाया |

२) मास्टर साहब के घर की तरफ जाते समय लेखक को कैसा मौसम मिला ?
उत्तर: लेखक दोपहर को दो बजे मास्टर साहब के घर की ओर निकला | उस समय सनसनाती हुई लू चल रही थी | सूर्य आग बरसा रहा था | लेखक इन सब की उपेक्षा कर नंगे पैर तथा नंगे सर पैदल ही मास्टर साहब के घर की ओर चल दिया | उस समय जमीन गरम तवे की तरह तपी हुई थी | लेखक को ऐसा अनुभव हो रहा था जैसे आग पर चल रहा हो | गरम लू से शरीर छिदता जा रहा था | ऐसी भयंकर गरमी लेखक ने जीवन में कभी अनुभव नहीं की थी |

३) लेखक ने किस तरह पश्चाताप किया ?
उत्तर: लेखक बहुत तेज गरमी में भी नंगे पैर तथा नंगे सर मास्टर साहब के घर की ओर चल पड़ा | मास्टर साहब एक पेड़ की घनी छाया के नीचे बिना कपड़ा बिछाये सोए हुए थे | मुख को छोड़कर उनका पूरा शरीर एक चादर से ढँका हुआ था | लेखक उनके पैरों के पास बैठकर धीरे-धीरे उनके पैर दबाने लगा | मास्टर साहब जाग उठे | लेखक को देखकर वे एकदम उठकर बैठ गए | उन्होंने लेखक को छाती से लगा लिया | मास्टर साहब की आँखों से आँसू बह रहे थे | इस घटना के बाद लेखक की सिफारिश के आधार पर मास्टर साहब का वेतन बढ़ाकर उन्हें एक प्रारंभिक विद्यालय का मुख्याध्यापक बना दिया गया | इस प्रकार लेखक ने पश्चाताप किया |

४) मास्टर साहब को लेखक के नीचे अधिक दिन काम क्यों नहीं करना पड़ा ?
उत्तर: मास्टर साहब को लेखक की सिफारिशों के आधार पर वेतन बढ़ाकर जिले के एक प्रारंभिक स्कूल का प्राध्यापक बना दिया गया था | इसलिए उन्हें लेखक के नीचे अधिक दिन काम नहीं करना पड़ा |

१) गुरु-शिष्य परंपरा को वर्तमान समय ने किस प्रकार प्रभावित किया है ? गुरु शिष्य परंपरा के आदर्श रूप को बनाये रखने के लिए क्या उपाय किये जाने चाहिये ? (ICSE 2014) अथवा
वर्तमान समय में गुरु शिष्य परंपरा में क्या अंतर आ गया है ? आपकी दृष्टि में इस परिवर्तन का क्या कारण है ? (ICSE – 2009)
उत्तर: वर्तमान समय में हमारे देश की शिक्षा पद्धति एक व्यवसाय का रूप ले चुकी है | इसमें सेवा का वो भाव नहीं रहा जो प्राचीन काल में भारत में होता था | गुरु अब पूजनीय न होकर पैसे लेकर जानकारी बेचने वाला एक सामान्य व्यक्ति हो गया है | शिक्षा देने का उद्देश्य अब शिष्य का विकास नहीं रह गया है | शिष्यों के मन में भी अब गुरुओं के लिए सम्मान नहीं बचा है | गुरु की बातों को न मानना, उनके सुझावों पर ध्यान न देना अब आम बात हो गया है | कई बार विद्यार्थी गुरु का अपमान भी कर बैठते हैं | कई माता-पिता भी बच्चों के इस तरह के व्यवहार को प्रोत्साहन देते हैं |
यदि हमें गुरु-शिष्य परंपरा का आदर्श रूप बनाये रखना है तो शिक्षा के इस व्यवसायी करण को रोकना होगा | शिष्यों का हित और उनका विकास ही गुरुओं का लक्ष्य होना चाहिए | शिष्यों को भी यह समझना चाहिए कि गुरु वो व्यक्ति है जो उनके जीवन को दिशा देता है | उन्हें यथेष्ट सम्मान देकर उनसे ज्ञान अर्जित करें |

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