मैं और मेरा देश (Main aur mera desh)

कवि: कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’

क) मानस में भूकंप उठा था |
१) प्रस्तुत कथन का प्रसंग स्पष्ट करें |
उत्तर: लेखक अपने घर, अपने पड़ोस तथा अपने नगर से पूरी तरह संतुष्ट था | उसे लगता था कि उसे जो कुछ भी चाहिए था वो सब उसके पास है | वह स्वयं को पूर्ण समझता था | ऐसे में उसकी मुलाकात पंजाब केसरी लाला लाजपतराय से हुई | उनकी बातें सुनकर लेखक के मानस में एक भूकंप उठा | लेखक को पहली बार अहसास हुआ कि आज तक प्राप्त की हुई हर चीज बेकार है | जब तक हमारे माथे पर देश की गुलामी का कलंक लगा हुआ है | हम कहीं भी गर्व से अपना सर नहीं उठा सकते |

२) लेखक को अपनी पूर्णता का बोध कब हुआ ?
उत्तर: लेखक को स्वयं का जीवन पूर्ण मानने के लिए जो-जो चाहिए था वो मिल गया था | उसे स्नेह करनेवाला परिवार मिला था | ऐसा पड़ोस मिला था जिससे ममता दुलार पाकर वो बड़ा हुआ था | समाज के ज्ञान भंडार का उपयोग कर, उसे अपनी सेवाओं का दान देकर, उसकी सेवा लेकर लेखक बड़ा हो चुका था | वह अपने नगर के लोगों का सम्मान करता था, वो भी उसका सम्मान करते थे | उसे अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए बहुतों की जरूरत पड़ती थी तथा वो बहुतों की जरूरत पूरी करता था | लेखक को जो कुछ चाहिए था, सब उसके पास था – उसका घर, उसका पड़ोस तथा उसका नगर | इससे लेखक को पूर्णता का बोध हुआ |

३) मानसिक भूकंप का क्या अर्थ है ?
उत्तर: मानसिक भूकंप का अर्थ है नवीन विचारों के मन में आगमन के कारण पुराने विश्वासों का टूटना | लेखक के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ | वह स्वयं को पूर्ण समझता था किंतु जिस दिन उन्होंने पंजाब-केसरी लाला लाजपतराय के विचार सुने, उस दिन उनके मन में जो विचारों तथा विश्वासों की दीवार थी वो टूटने लगी | लेखक को पता चल गया कि जब तक हमारा देश गुलाम है हमारी पूर्णता का कोई अर्थ नहीं रह जाता | विचारों के इस परिवर्तन को लेखक ने मानसिक भूकंप कहा है |

४) लेखक के मन में भूकंप किसने उठाया था ?
उत्तर: लेखक के मन में भूकंप उठाया पंजाब-केसरी लाला लाजपतराय ने | लेखक अपने घर, समाज, पड़ोस तथा नगर में रहकर स्वयं को पूर्ण समझता था | किंतु लाला लाजपतराय ने एक ही वाक्य में लेखक की पूर्णता की ठसक को अपूर्णता की कसक में बदल दिया | वह वाक्य था “मैं अमेरिका गया, इंग्लैंड गया, फ्रांस गया और संसार के दूसरे देशों में भी गया, भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा |” लालाजी की इस बात ने लेखक के मन में मानसिक भूकंप ला दिया |

ख) अजी भला एक आदमी अपने इतने बड़े देश के लिए कर ही क्या सकता है ?
१) लेखक ने अकेले आदमी की देश के लिए क्या भूमिका बताई है ?
उत्तर: लेखक का मत है कि हर आदमी अपने-अपने स्तर पर देशहित में भूमिका निभा सकता है | उसके लिए उसे बहुत बड़ा वैज्ञानिक या बहुत बड़ा धनी होना जरूरी नहीं है | अकेला व्यक्ति भी अपने अच्छे कार्यों से देश के हित में अपना योगदान दे सकता है | लेखक इसके लिए स्वामी रामतीर्थ के साथ जापान में घटी एक घटना का उदाहरण भी देते हैं | जहाँ युवक स्वामी रामतीर्थ के लिए फल खोज कर लाता है तथा उनके पैसे भी नहीं लेता | वह बस स्वामीजी से इतनी प्रार्थना करता है कि वे अपने देश में किसी से जाकर यह नहीं कहे कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते | ठीक इसके विपरीत अपने बुरे कार्यों से देश का अहित भी कर सकते हैं, इसके लिए भी लेखक जापान के पुस्तकालय में घटी एक घटना का उदाहरण देते हैं | जहाँ युवक किताब से चित्र चुराकर अपना तथा अपने देश का नाम खराब करता है | हर व्यक्ति को कोई भी कर्म करने से पहले इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह कर्म देश के अनुकूल है या प्रतिकूल |

२) व्यक्ति युद्ध पर लड़ने वालों के लिए क्या कर सकता है ?
उत्तर: युद्ध में लड़नेवालों के अलावा साधारण व्यक्ति भी अपना योगदान दे सकता है | यदि वह किसान है तो अधिक से अधिक अन्न उपजा सकता है ताकि सिपाहियों को उसकी कमी न पड़े | वह सिपाहियों को युद्ध के दौरान सामग्री पहुँचा सकता है | यदि अन्य किसी तरीके से योगदान देने में समर्थ न हो तो वह युद्ध में लड़नेवालों की जयजयकार कर उनका उत्साह बढ़ा सकता है |

३) कवि सम्मेलनों की सफलता किस पर निर्भर करती है ?
उत्तर: कवि सम्मेलनों तथा मुशायरों की सफलता दाद देने वालों पर निर्भर करती है | लोग जिस उत्साह से दाद देते हैं, कवि तथा शायर का आत्मविश्वास उससे ही बढ़ता है |

४) लेखक ने देश के लिए व्यक्ति के अकेले प्रयास की क्या उपयोगिता बताई है ?
उत्तर: लेखक का मत है कि हर आदमी अपने-अपने स्तर पर देश हित में भूमिका निभा सकता है | उसके लिए उसे बहुत बड़ा वैज्ञानिक या बहुत बड़ा धनी होना जरूरी नहीं है | अकेला व्यक्ति भी अपने अच्छे कार्यों से देश के हित में अपना योगदान दे सकता है | लेखक इसके लिए स्वामी रामतीर्थ के साथ जापान में घटी एक घटना का उदाहरण भी देते हैं | जहाँ युवक स्वामी रामतीर्थ के लिए फल खोज कर लाता है तथा उनके पैसे भी नहीं लेता | वह बस स्वामी जी से इतनी प्रार्थना करता है कि वे अपने देश में किसी से जाकर यह नहीं कहे कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते | ठीक इसके विपरीत अपने बुरे कार्यों से देश का अहित भी कर सकते हैं, इसके लिए भी लेखक जापान के पुस्तकालय में घटी एक घटना का उदाहरण देते हैं | जहाँ युवक किताब से चित्र चुराकर अपना तथा अपने देश का नाम खराब करता है | हर व्यक्ति को कोई भी कर्म करने से पहले इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह कर्म देश के अनुकूल है या प्रतिकूल |

ग) “जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते |”
१) उपर्युक्त कथन का वक्ता कौन है ? परिचय दें |
उत्तर: उपर्युक्त कथन के वक्ता हमारे देश के महान संत स्वामी रामतीर्थ हैं | वे जापान की यात्रा कर रहे थे | उस समय वे भोजन में सिर्फ फल लेते थे | गाड़ी जब एक स्टेशन पर रुकी तो उन्होंने फलों की खोज की पर उन्हें फल नहीं मिले | इसलिए उन्होंने कहा कि जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते |

२) वक्ता ने ऐसा क्यों कहा ?
उत्तर: वक्ता भारत के महान संत स्वामी रामतीर्थ हैं | वे जापान की यात्रा कर रहे थे | उस समय वे भोजन में सिर्फ फल लेते थे | गाड़ी जब एक स्टेशन पर रुकी तो उन्होंने फलों की खोज की पर उन्हें फल नहीं मिले | इसलिए उन्होंने कहा कि जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते |

३) जापानी युवक ने क्या किया ?
उत्तर: जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ को यह बोलते हुए सुन लिया कि जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते | वह अपनी पत्नी को रेल में बैठाने आया था | वह तुरंत अपनी बात छोड़कर भागा और एक टोकरी ताजे फल ले आया | उसने वो फल स्वामी रामतीर्थ को भेंट किया | स्वामी जी ने समझा यह कोई फल बेचने वाला है | उन्होंने युवक से फलों के दाम पूछे पर उसने दाम लेने से इनकार कर दिया | युवक ने स्वामी जी से प्रार्थना की कि यदि वे फलों का मूल्य देना चाहते हैं तो वह यह है कि अपने देश में किसी से जाकर यह न कहें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते |

४) जापानी युवक ने वक्ता से पैसे न लेकर क्या आग्रह किया और क्यों ?
उत्तर: जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ को यह बोलते हुए सुन लिया कि जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते | वह अपनी पत्नी को रेल में बैठने आया था | वह तुरंत अपनी बात छोड़कर भागा और एक टोकरी ताजे फल ले आया | उसने वो फल स्वामी रामतीर्थ को भेंट किया | स्वामीजी ने समझा यह कोई फल बेचने वाला है | उन्होंने युवक से फलों के दाम पूछे पर उसने दाम लेने से इनकार कर दिया | युवक ने स्वामीजी से आग्रह किया कि यदि वे फलों का मूल्य देना चाहते हैं तो वह यह है कि अपने देश में किसी से जाकर यह न कहे कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते |

घ) उस विद्यार्थी को जापान से निकाल दिया गया |
१) विदेशी विद्यार्थी को जापान से क्यों निकाल दिया गया ?
उत्तर: विदेशी विद्यार्थी जापान के सरकारी पुस्तकालय से कोई पुस्तक पढ़ने को लाया था | उस पुस्तक में कुछ दुर्लभ चित्र थे | उन चित्रों को युवक ने निकाल लिए और पुस्तक वापस कर आया | किसी जापानी विद्यार्थी ने यह देख लिया और पुस्तकालय को इसकी सूचना दी | पुलिस ने तलाशी लेकर वे चित्र उस विद्यार्थी के कमरे से बरामद किये और उस विद्यार्थी को जापान से निकाल दिया गया |

२) विद्यार्थी की हरकत से उसके देश का सम्मान किस तरह घटा ?
उत्तर: एक विदेशी विद्यार्थी सरकारी पुस्तकालय से कोई पुस्तक पढ़ने को लाया था | उस पुस्तक में कुछ दुर्लभ चित्र थे | उन चित्रों को युवक ने निकाल लिए और पुस्तक वापस कर आया | किसी जापानी विद्यार्थी ने यह देख लिया और पुस्तकालय को इसकी सूचना दी | पुलिस ने तलाशी लेकर वे चित्र उस विद्यार्थी के कमरे से बरामद किये और उस विद्यार्थी को जापान से निकाल दिया गया | मामला यहीं तक नहीं रहा | उस पुस्तकालय के बाहर बोर्ड पर लिख दिया गया कि उस देश का (जिसका वह विद्यार्थी था) कोई निवासी उस पुस्तकालय में प्रवेश नहीं कर सकता | इस तरह उस विद्यार्थी ने अपने देश का सम्मान घटा दिया |

३) जापान की दो घटनाओं का उदाहरण देकर लेखक ने क्या स्पष्ट किया है ?
उत्तर: जापान की दो घटनाओं का उदाहरण देकर लेखक ने स्पष्ट किया है कि देश का हर एक नागरिक अपने देश के साथ बँधा हुआ है | देश की हीनता और गौरव का फल उसे मिलता है तथा उसकी हीनता तथा गौरव का फल देश को मिलता है |

४) देश का नागरिक होने के नाते लेखक ने कौन से कर्तव्य और सम्मान की बात कही है ?
उत्तर: लेखक ने कहा है कि जैसे हम अपने लाभ तथा सम्मान के लिए हरेक छोटी-छोटी बात पर ध्यान देते हैं, वैसे ही अपने देश के लाभ तथा सम्मान के लिए भी छोटी-छोटी बात पर ध्यान दें, यह हमारा कर्तव्य है | जैसे हम अपने सम्मान तथा साधनों से अपने जीवन में सहारा पाते हैं, वैसे ही देश के सम्मान तथा साधनों से सहारा पायें, यह हमारा अधिकार है |

ङ) महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं है, उस कार्य के करने की भावना में है |
१) बूढ़े ने कमालपाशा को क्या भेंट दिया ?
उत्तर: तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा को उनके वर्षगाँठ पर भेंट करने एक देहाती बुढ़ा आया था | वह तीस मील से पैदल चलकर आया था | उपहार में वह पाव भर शहद मिट्टी की छोटी सी हँड़िया में लाया था, जिसे उस बूढ़े ने स्वयं तोड़ा था |

२) कमालपाशा ने बूढ़े के उपहार को सर्वोत्तम क्यों कहा ?
उत्तर: बुढा उपहार के तौर पर राष्ट्रपति कमालपाशा के लिए पाँव-भर शहद मिट्टी की हँडिया में लाया था | कमालपाशा ने हँडिया को स्वयं खोला और उसमें से दो उँगलियाँ भरकर शहद चाटने के बाद तीसरी उँगली शहद से भरकर बूढ़े को भी खिलाया | कमालपाशा ने बूढ़े के उपहार को सर्वोत्तम कहा क्योंकि उसमें उसके ह्रदय का शुद्ध प्यार था | शहद बहुत कीमती नहीं था पर उसके पीछे उसको लाने वाले की भावना थी, जिसने उसे अमुल्य बना दिया |

३) किसान नेहरूजी से मिलने क्यों गया था ?
उत्तर: किसान ने रंगीन सुतलियों से एक खात बुनी थी | वह उसे रेल में रखकर दिल्ली लाया | दिल्ली स्टेशन से उस खाट को कंधे पर रखकर वह भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरु की कोठी पर गया | वह खाट वह उन्हें भेंट करना चाहता था | पंडितजी ने उसका वह उपहार प्यार से स्वीकार किया, बदले में उसे अपना एक फोटो दस्तखत करके दिया |

४) नेहरूजी ने किसान को अपनी दस्तखत की हुई फोटो क्यों दी ?
उत्तर: किसान ने रंगीन सुतलियों से एक खात बुनी थी | वह उसे रेल में रखकर दिल्ली लाया | दिल्ली स्टेशन से उस खाट को कंधे पर रखकर वह भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरु की कोठी पर गया | वह खाट वह उन्हें भेंट करना चाहता था | पंडितजी ने उसका वह उपहार प्यार से स्वीकार किया व उसकी भावना का सम्मान करते हुए बदले में उसे अपना एक फोटो दस्तखत करके दिया |

च) हमारे देश को दो बातों की सबसे ज्यादा जरूरत है | एक शक्तिबोध तथा दूसरा सौंदर्य बोध |
१) हमारे किन कार्यों से देश के शक्तिबोध को चोट पहुँचती है ?
उत्तर: यदि हम रेलों में, मुसाफिरखानों में, क्लबों में, चौपालों पर और मोटर बसों में कभी ऐसी चर्चा करते हैं कि हमारे देश में यह नहीं हो रहा है, वह नहीं हो रहा है और यह गड़बड़ है, वह परेशानी है | साथ ही यदि हम इन स्थानों में या इस तरह के दूसरे स्थानों में भी अपने देश के साथ दूसरे देशों की तुलना करते हैं और इस तुलना में अपने देश को हीन और दूसरे देशों को श्रेष्ठ सिद्ध करते हैं तो हमारे इन कार्यों से देश के शक्तिबोध को चोट पहुँचती है |

२) शल्य ने किस तरह कर्ण के भावी पराजय की नींव रखी ?
उत्तर: शल्य महाबली कर्ण का सारथी था | जब भी कर्ण अपने पक्ष के विजय की घोषणा करता, हुंकार भरता, शल्य अर्जुन की अजेयता का हल्का सा उल्लेख कर देता | बार-बार के इस उल्लेख ने कर्ण के सघन आत्मविश्वास में संदेह की तरेड़ डाल दी, जिसने उसके भावी पराजय की नींव रखी |

३) हमारे किन कार्यों से हमारे देश के सौंदर्य बोध को आघात लगता है ?
उत्तर: यदि हम कभी केला खाकर छिलका रास्ते में फेंकते हैं | अपने घर का कूड़ा बाहर फेंकते हैं | मुँह में गंदे शब्दों से गंदे भाव प्रकट करते हैं | इधर की उधर, उधर की इधर लगाते हैं | अपना घर, दफ्तर, गली गंदा रखते हैं | होटलों, धर्मशालाओं में या दूसरे ऐसे ही स्थानों में, जीनों में, कोनों में पीक थूकते हैं | उत्सवों, मेलों, रेलों और खेलों में ठेलमठेल करते हैं | निमंत्रित होने पर समय से लेट पहुँचते हैं या वचन देकर भी घर आनेवालों को समय पर नहीं मिलते हैं या और किसी तरह किसी भी रूप में सुरुचि तथा सौंदर्य को ठेस पहुँचाते हैं तो हमारे इन कार्यों से देश के सौंदर्यबोध को आघात लगता है |

४) देश के उच्चता और हीनता की कसौटी क्या है ?
उत्तर: किसी भी देश के उच्चता और हीनता की कसौटी है वहाँ का चुनाव | यदि देश के नागरिक यह समझते हैं कि चुनाव में किसे अपना मत देना चाहिए और किसे नहीं, वह देश उच्च है | और जहाँ के नागरिक गलत लोगों के उत्तेजक नारों या व्यक्तियों के गलत प्रभाव में आकर मत देते हैं, वह देश हीन है |

१) देश की परतंत्रता उसके तथा उसके नागरिकों की उपलब्धियों को शून्य में बदल देती है | इस पर अपने विचार लिखिए |
उत्तर: एक परतंत्र देश चाहे कितनी भी प्रगति करे या कितना भी संपन्न हो, उसे संसार में कहीं सम्मान नहीं मिलता | देश की गुलामी का कलंक हमेशा माथे पर लगा रहता है | परतंत्रता का जीवन दूसरों की दया से पाया हुआ जीवन होता है | परतंत्र देश तथा परतंत्र व्यक्ति का कोई आत्मसम्मान नहीं होता | यदि कोई गुलाम व्यक्ति या गुलाम देश कोई बड़ी उपलब्धि पा भी ले तो ये उसकी उपलब्धि न होकर उसके शासक देश के द्वारा किये हुए उपकार की तरह होता है | ऐसे में उन उपलब्धियों का मूल्य शून्य से अधिक नहीं होता |

२) क्या आप मानते हैं कि देश की असफलताओं की लगातार चर्चा करते रहने से उसकी प्रगति में बाधा पहुँचती है ?
उत्तर: देश की असफलताओं की लगातार चर्चा करने से देश में एक हताशा और निराशा का वातावरण पैदा होता है | लोग यह सोचना शुरू कर देते हैं कि हमारा देश कभी आगे नहीं बढ़ सकता | लोग पुरुषार्थ करना बंद कर देते हैं | देश की प्रगति रुक जाती है | कई बार असफलताओं की चर्चा करनी जरूरी होती है ताकि उस असफलता का कारण जानकर अगली बार गलती दोबारा न दोहराई जाए | ऐसी कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर बाकी समय देश की असफलताओं की चर्चा देश की प्रगति को बाधा पहुँचाती है |

३) ‘महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं होता, उस कार्य को करने की भावना में होता है |’ प्रस्तुत पाठ के आधार पर इस पंक्ति की समीक्षा कीजिये | (ICSE 2013)
उत्तर: हर कार्य अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण होता है | किसी कार्य की विशालता महत्वपूर्ण नहीं होती | उस कार्य को करनेवाले की भावना महत्वपूर्ण होती है | छोटे से छोटे लगनेवाले काम को भी यदि अपना कर्तव्य समझकर आनंद और प्रेम से किया जाए तो उसका महत्व बढ़ जाता है | इसके विपरीत बड़े से बड़े काम को भी बोझ समझकर, मन मारकर किया जाए तो उस काम का महत्व कम हो जाता है | इसलिए हर कार्य को महत्वपूर्ण मानकर करना चाहिए |

४) प्रस्तुत पाठ में लेखक ने देश के नागरिकों को आम चुनावों में किन बातों पर ध्यान देने का सुझाव दिया है ? (ICSE 2010)
उत्तर: लेखक के अनुसार देश के प्रत्येक व्यक्ति को मत अवश्य देना चाहिए | साथ ही साथ मत देते समय हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि गलत लोगों के उत्तेजक नारों या व्यक्तियों के गलत प्रभाव में आकर मत नहीं देना है | हमेशा सही व्यक्ति को अपना मत दे तथा इस बात पर हमेशा दृढ़ रहे कि हमारे मत के बिना कोई भी व्यक्ति, चाहे वो संसार का सर्वश्रेष्ठ महापुरुष क्यों न हो, उसे अधिकार की कोई कुर्सी न मिले |

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