मानवता (Maanavata)

कवि : मैथिलीशरण गुप्त

क) विचार लो कि मर्त्य हो ……………………………………. आप-आप ही चरे |
१) प्रस्तुत पद्य खंड किस कविता से लिया गया है ? कवि का परिचय दीजिये |
उत्तर: प्रस्तुत पद्यखंड ‘मानवता’ नामक कविता से लिया गया है | इसके कवि श्री मैथिलीशरण गुप्त हैं | खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करनेवालों में गुप्त जी का स्थान सर्वोपरि है | इन्होंने मानव जीवन के प्रायः सभी अवस्थाओं का वर्णन अपने काव्य में किया है | इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं ‘साकेत’, ‘यशोधरा’, ‘द्वापर’, ‘जयभारत’, ‘पंचवटी’ इत्यादि | भारत सरकार ने इन्हें पद्म-भूषण अलंकार से सम्मानित किया है |

२) किस तरह के जीवन और मृत्यु को कवि वृथा मानते हैं?
उत्तर: कवि के अनुसार मनुष्य का जीवन दूसरों की सेवा के लिए होता है | मनुष्य को अपनी पूरी शक्ति से लोगों के कष्ट दूर करने के लिए, उनके दुख मिटाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए | मनुष्य की मृत्यु के बाद लोग उसे उसके अच्छे कर्मों के कारण याद करें, तो ही उसका जीवन और उसकी मृत्यु सार्थक है, अन्यथा दोनों व्यर्थ है |

३) कवि के अनुसार सु-मृत्यु क्या है ?
उत्तर: कवि के अनुसार मनुष्य का जीवन दूसरों की सेवा के लिए होता है | मनुष्य को अपनी पूरी शक्ति से लोगों के कष्ट दूर करने के लिए, उनके दुख मिटाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए | मनुष्य की मृत्यु के बाद लोग उसे उसके अच्छे कर्मों के कारण याद करें, तो ही उसकी मृत्यु सार्थक है | इसे ही कवि सु-मृत्यु कहते हैं |

४) पशु-प्रवृत्ति से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: यदि कोई मनुष्य जीवन भर सिर्फ अपने लाभ के लिए ही कर्म करता है | दूसरों के हित की नहीं सोचता | लोगों के कष्ट दूर करने के लिए प्रयत्न नहीं करता | उसका सारा ध्यान सिर्फ खुद के लिए पैसे कमाना, संसार के मजे लेना जैसी बातों पर हो तो ऐसी प्रवृत्ति वाले व्यक्ति को कवि पशु-प्रवृत्ति का कहते हैं |

ख) उसी उदार की कथा …………………………….. असीम विश्व में भरे |
१) कवि उदार शब्द किसके लिए प्रयोग कर रहे हैं ?
उत्तर: जो मनुष्य दूसरों के हित के लिए कार्य करता है, कष्ट में पड़े व्यक्तियों की सेवा में जीवन बिताता है | अपने स्वयं के लाभ के स्थान पर समाज के लाभ को प्रधानता देता है | दूसरों की रक्षा में स्वयं के प्राण देता है | ऐसे व्यक्ति के लिए कवि उदार शब्द का प्रयोग कर रहे हैं |

२) परहित का कार्य करनेवाले उदार व्यक्तियों की प्रशंसा कवि किन शब्दों में कर रहे हैं ?
उत्तर: कवि के अनुसार जो मनुष्य परहित में कर्म करता है ऐसे उदार व्यक्ति की प्रशंसा स्वयं माता सरस्वती करती हैं | ऐसे उदार व्यक्तियों के जन्म के कारण धरती माता स्वयं को भाग्यशाली मानती है | ऐसे व्यक्ति की कीर्ति सारे संसार फैलती जाती है | पूरा संसार उनको आदर सम्मान देता है |

३) कवि की दृष्टि में मनुष्य कौन है ?
उत्तर: जो व्यक्ति पूरे संसार को अपना मानता है, दूसरों के हित के लिए बलिदान देने से पीछे नहीं हटता, चाहे प्राण ही क्यों न देना पड़े, ऐसे व्यक्ति को कवि मनुष्य मानता है | ऐसा व्यक्ति सदा परोपकार में लगा रहता है | वह अपनी प्रगति के साथ-साथ दूसरों की प्रगति के बारे में भी सोचता है | उसे अपने पुरुषार्थ तथा ईश्वर की कृपा दोनों पर पूरा विश्वास होता है | कवि की दृष्टि में ऐसे मनुष्य ही सच्चे मनुष्य हैं |

४) पूरे विश्व में अखंड आत्मभाव भरने का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: पूरे विश्व में अखंड आत्मभाव भरने का अर्थ है पूरे संसार को अपना ही हिस्सा मानना | मनुष्य जिस व्यक्ति या वस्तु को अपना मानता है, वह कभी उसके साथ भेदभाव नहीं करता | अपनेपन की भावना संसार की बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान कर सकती हैं | इसलिए यदि मनुष्य पूरे विश्व को अपना मान ले तो पूरे संसार में क्षणभर में शांति स्थापित हो जायेगी |

ग) क्षुधार्थ रंतिदेव ने ……………………………….. अनादि जीव क्या डरे |
१) रंतिदेव कौन थे ? उनके त्याग की क्या कथा है ?
उत्तर: राजा रंतिदेव परमदानी थे | उनहोने अपना पूरा राज्य, धन-संपत्ति सब कुछ दान में दे दिया था | उन्हें परिवार के साथ वन में रहना पड़ रहा था | एक बार अन्न नहीं मिलने के कारण वे ४० दिन तक भूखे थे | इकतालीसवें दिन उन्हें कुछ अन्न प्राप्त हुआ | वो उसे खाने की तैयारी में थे कि भगवान ब्राह्मण का रूप लेकर आये तथा वो अन्न भी दान में माँग लिया | राजा रंतिदेव ने प्रसन्नता के साथ वो अन्न ब्राह्मण को दान दे दिया | इससे उनकी दानशीलता का पता चलता है |

२) ऋषि दधीचि ने अपनी अस्थि क्यों दान कर दी थी ?
उत्तर: ऋषि दधीचि की कथा का वर्णन पुराणों में आता है | एक बार देवता और दानवों में महासंग्राम मचा था | दैत्यों का राजा वृत्रासुर महापराक्रमी था | इंद्र के पास कोई ऐसा अस्त्र नहीं था जिससे उसका वध किया जा सके | भगवान ब्रह्मा ने इंद्र को बताया कि सिर्फ ऋषि दधीचि की अस्थियों से बने अस्त्र से ही वृत्रासुर को मारा जा सकता है |
इंद्र ने ब्राह्मण का वेश बनाया और दान में ऋषि दधीचि से उनकी अस्थियाँ माँग ली | ऋषि ने लोकहित में उनकी याचना स्वीकार करते हुए तत्काल अपने प्राण त्याग दिए | उनकी अस्थियों से बने वज्र द्वारा इंद्र ने वृत्रासुर का वध किया |

३) उशीनर क्षितीश ने स्वमांस का दान क्यों किया था ?
उत्तर: उशीनर के क्षितीश अर्थात उशीनर के राजा शिवि परम दानी थे | एक बार देवताओं ने उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया | एक दिन अग्निदेव कबूतर का रूप लेकर उड़ते-उड़ते महाराज शिवि के गोद में जा गिरे | उनका पीछा करते-करते देवराज इंद्र बाज का रूप लेकर वहाँ पहुँच गए | उन्होंने राजा शिवि से उस कबूतर को माँगा और कहा कि यह मेरा भोजन है | महाराजा शिवि शरण में आये हुए कबूतर की रक्षा को अपना कर्तव्य समझते थे | उन्होंने बाज से कहा कि इस कबूतर का जितना भार है, आप मेरे शरीर से उतना मांस ले लीजिये | तराजू के एक पलड़े में उन्होंने कबूतर रखा तथा दूसरे पलड़े में अपना मांस काट-काट कर डालते गए, किंतु फिर भी मांस पूरा न पड़ा | तब महाराज शिवि स्वयं उस पलड़े में बैठ गए और अपना पूरा शरीर बाज को दे दिया | उनकी इस दानशीलता से देवता बहुत प्रसन्न हुए |

४) कर्ण की दानवीरता क्यों प्रसिद्ध है ?
उत्तर: कर्ण भगवान सूर्य के पुत्र थे | उनके शरीर पर बचपन से ही कवच और कुंडल था, जिसके रहते संसार में कोई भी कर्ण का वध नहीं कर सकता था | अर्जुन को विजय दिलाने के लिए देवराज इंद्र ने ब्राह्मण का रूप बनाकर कर्ण से वो कवच और कुंडल दान में माँग लिया | कर्ण ने प्रसन्नतापूर्वक उन दोनों को अपने शरीर से काटकर निकाला और दान में दे दिया |

५) कवि देह को अनित्य और जीव को अनादि क्यों कह रहा है ?
उत्तर: अनित्य का अर्थ होता है जो हमेशा नहीं टिकता | मनुष्य का शरीर भी वैसा ही होता है | कुछ समय संसार में रहने के बाद मृत्यु इसे नष्ट कर देती है | इसलिए कवि देह को अनित्य कहता है |
इसके विपरीत देह में रहनेवाली जीवात्मा अमर होती है | वह अलग-अलग शरीर का उपयोग करती है व समय आने पर उसका त्याग कर देती है | जीवात्मा की कोई आयु नहीं होती | परमात्मा का अंश होने के कारण वह अनादि है अर्थात उसका नाश नहीं होता | इसलिए कवि जीव को अनादि कहते हैं |

घ) सहानुभूति चाहिए, …………………………….. अधीर भाव जो करे |
१) प्रस्तुत पद्यखंड में किन मानवीय गुणों की प्रशंसा की गयी है ?
उत्तर: प्रस्तुत पद्यखंड में सहानुभूति, दया, परोपकार, उदारता जैसे मानवीय गुणों की प्रशंसा की गयी है | कवि के अनुसार जिन व्यक्तियों में ये गुण हो, पूरा संसार उनके वश में होता है | उनके शत्रु भी उनके सामने झुक जाते हैं | ऐसे व्यक्ति ही वास्तव में मनुष्य कहलाने के योग्य हैं |

२) भगवान बुद्ध के किन गुणों के कारण पूरा संसार उनके सम्मुख नतमस्तक हो गया ?
उत्तर: भगवान बुद्ध दया के सागर थे | उन्होंने अपना पूरा जीवन परोपकार में लगा दिया | उनसे शत्रुता करनेवालों से भी वो अपार प्रेम करते थे | उनकी दया और करुणा के कारण उनके विरोधी भी उनके सामने झुक गए, पूरा संसार उनके सामने नतमस्तक हो गया |

३) कवि किन मनुष्यों को भाग्यहीन कह रहा है और क्यों?
उत्तर: जो मनुष्य अपने आप को अनाथ मानते हैं, कमजोर मानते हैं, ऐसे व्यक्ति को कवि भाग्यहीन कह रहे हैं | कवि के अनुसार संसार में कोई भी मनुष्य अनाथ नहीं है | ईश्वर सबके साथ है, प्रत्येक व्यक्ति के पालन-पोषण और रक्षा का भार उसपर है | उसके हाथ विशाल है | ऐसी परिस्थिति में संसार का कोई भी मनुष्य यदि स्वयं को अनाथ मानकर अधीर हो जाता है तो वो भाग्यहीन है |

४) प्रस्तुत पद्यांश में मनुष्य को किस बात पर गर्व नहीं करने की सलाह दी गयी है ?
उत्तर: कवि के अनुसार मनुष्य को सांसारिक धन-संपत्ति का गर्व नहीं होना चाहिए | यह संपत्ति, यह सामर्थ्य ईश्वर की अनंत सत्ता के सामने कुछ भी नहीं है | संसार की सारी उपलब्धियाँ कब नष्ट हो जाएँ, इसका कोई ठिकाना नहीं | इसलिए सामर्थ्यशाली होने के कारण मन में किसी प्रकार का घमंड नहीं लाना चाहिए |

ङ) अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े …………….. तारता हुआ तरे |
१) देवताओं का संदर्भ देकर देकर कवि क्या कहना चाहते हैं ?
उत्तर: कवि कह रहे हैं कि अंतरिक्ष में अनंत देवता हमारी सहायता के लिए अपनी बाहें पसारकर खड़े हैं | इससे कवि मनुष्य को परस्पर सहयोग की भावना विकसित करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं | सभी को एक दूसरे की सहायता कर ऊपर उठना चाहिए, प्रगति करनी चाहिए | विश्वबंधुत्व की भावना सुदृढ़ करनी चाहिए |

२) अमर्त्य अंक में अपंक होकर चढने का क्या अर्थ है?
उत्तर: यहाँ अपंक होने का अर्थ पवित्र होने से है | जिस व्यक्ति में परोपकार की भावना होती है, जिसका मन दूसरों की सेवा तथा सहायता करके पवित्र होता है, स्वार्थ की भावना जिनके ह्रदय में नहीं होती, ऐसा व्यक्ति ही ईश्वर की गोद में जाने के योग्य होता है | मानवता के ऐसे सेवक अमर हो जाते हैं |

३) अपनी मंजिल की ओर किस तरह बढ़ना चाहिए ?
उत्तर: मनुष्य को अपनी मंजिल की ओर प्रसन्नतापूर्वक बढ़ना चाहिए | राह में चाहे जितने भी विघ्न आये, उनका सामना कर उन्हें दूर करना चाहिए | सभी लोगों के साथ मिलजुलकर, एकता बढ़ाते हुए अपने पथ पर बढ़ते जाना चाहिए | हम सभी एक ही पथ के राही हैं, सबको मार्ग में सावधान रहना चाहिए | एक दूसरे की सहायता कर साथ में आगे बढ़ना ही सामर्थ्यशाली होने का प्रमाण है |

४) समर्थ भाव से कवि का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: समर्थ भाव का अर्थ है क्षमता से भरा हुआ | जो मनुष्य स्वयं प्रगति करता है, तथा दूसरों की सहायता कर उन्हें भी प्रगति के पथ पर अग्रसर कराता है, स्वयं की सफलता के साथ-साथ दूसरों की सफलता में भी उसका योगदान होता है, ऐसे व्यक्ति को ही समर्थ भाव से भरा हुआ कहते हैं | कवि अप्रत्यक्ष रूप से परोपकार के गुण का महत्व बता रहे हैं |

अतिरिक्त प्रश्न
१) प्रस्तुत कविता किस रचना से ली गयी है ? इसमें किन मूल्यों की अभिव्यक्ति हुई है ?
उत्तर: प्रस्तुत कविता मैथिलीशरण गुप्त जी की भारत-भारती से ली गयी है | इस कविता में अतीत के गौरव-गान, भारतीय संस्कृति की गरिमा, राष्ट्र-प्रेम और उदात्त तथा शाश्वत जीवनमूल्यों की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है | इस कविता में कवि ने मानवप्रेम तथा परोपकार को सबसे बड़ा धर्म बताया है |

२) दूसरों के लिए जीना ही वास्तविक जीवन है | इसपर अपने विचार लिखिए |
उत्तर: मानव इतिहास में जितने भी महान तथा पूजनीय व्यक्ति हुए हैं, सबकी शिक्षाओं में एक बात समानहै, वो है प्राणिमात्र की सेवा | जो अपना जीवन अन्य लोगों की सेवा में बिताते हैं उनका जीवन सफल माना जाता है | ऐसे लोग मनुष्यों में रत्न होते हैं | लोगों की सेवा द्वारा वे संसार के सर्वोत्तम सिंहासन के अधिकारी बन जाते हैं | दूसरों के लिए समर्पित जीवन उन्हें निस्वार्थी बना देता है | ऐसा व्यक्ति सबके लिए पूजनीय हो जाता है | स्वयं के लिए जीनेवाले मनुष्य और पशु में कोई अंतर नहीं होता | वास्तविक जीवन वही है जो दूसरों के काम आए |

३) देह को अनित्य मानने से मनुष्य के स्वभाव पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर: देह को अनित्य मानने से मनुष्य के मन का भय, लालच, अहंकार सब समाप्त हो जाता है | मनुष्य समझ जाता है कि यह शरीर तो हमेशा नहीं रहेगा, तो इसके लिए छल-कपट करने का क्या लाभ ? ऐसे शरीर को सम्मान मिले या अपमान, इससे क्या अंतर पड़ता है ? इससे धीरे-धीरे देह में मनुष्य की आसक्ति समाप्त होने लगती है | संसार से भी उसका मोह कम होने लगता है | देह की अनित्यता मनुष्य के मन में वैराग्य जगा देती है | भगवान बुद्ध के साथ भी यही हुआ था | इस प्रकार देह को अनित्य मानने से मनुष्य का स्वभाव पूरी तरह बदल जाता है |

४) मानवता से आप क्या समझते हैं ? इस कविता से आप को क्या प्रेरणा मिली ? (ICSE 2014)
उत्तर: मानवता का अर्थ होता है दूसरों के कष्ट दूर करना, चाहे इसके लिए स्वयं को कष्ट उठाना पड़े | यह संसार दुखों से भरा पड़ा है | ऐसे में वास्तविक मनुष्य वही है जो अपना जीवन दूसरों के दुखों को दूर करने के लिए समर्पित कर दे | इस कविता से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हमें अपने सुख की परवाह न करते हुए मनुष्य मात्र के भले के लिए सदा कार्य करते रहना चाहिए | परहित में लगे ऐसे व्यक्ति को पूरा संसार सम्मान देता है |

५) ‘समर्थ भाव’ से जीना किसे कहे हैं ? यह भाव मनुष्यता के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ? (ICSE 2008)
उत्तर: जो मनुष्य जीवन पथ पर कर्म करते हुए बाधाओं और अडचनों से नहीं घबराता, उसके जीने को समर्थ भाव से जीना कहते हैं | ऐसा व्यक्ति अपना जटिल से जटिल काम भी स्वयं करता है | वह अपने कार्य के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहता | ऐसे व्यक्ति दूसरों की भलाई का कार्य करने में भी सक्षम होते हैं | यह भाव मनुष्य के पुरुषार्थ का आधार है | इसी भावना के कारण मनुष्य ने कई असंभव कार्य संभव कर दिखाए हैं | संसार की हर सभ्यता समर्थ भाव से जीने वाले व्यक्तियों के कारण ही संभव हो पायी है |

६) प्रस्तुत कविता को पढ़ कर आपको क्या प्रेरणा मिली ? (ICSE 2008)
उत्तर: प्रस्तुत कविता राष्ट्रप्रेम और जीवन मूल्यों की कविता है | इससे शिक्षा मिलती है कि मनुष्य को परोपकारी, दूसरों के प्रति प्रेम, स्नेह तथा सहानुभूति की भावना रखने वाला होना चाहिए | मनुष्य को मृत्यु का भय छोड़कर तथा स्वार्थ की भावना त्यागकर संसार के कल्याण हेतु कार्य करने चाहिए | मानवता के लिए जीने वाला व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त होकर भी अमर रहता है |

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