आत्मनिर्भर भारत

वर्ष 2020 लंबे समय तक मनुष्य जाति के इतिहास में याद किया जाता रहेगा | कोरोना नामक महामारी ने इतना बड़ा संकट खड़ा कर दिया है कि लाखों मनुष्यों को अपने प्राण गवाने पड़े | पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था ठप्प पड़ गयी | हमारा देश भारत भी घोर संकट की स्थिति में आ गया | कोरोना के कारण लाखों लोगों के रोजगार पर संकट उत्पन्न हो गया है | इस संकट की स्थिति से देश को निकालने के लिए हमारे प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर भारत नामक योजना की घोषणा की है |

आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत प्रधानमंत्री ने 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा की है | इसके द्वारा किसानों, श्रमिकों, मध्य वर्ग, व्यापारियों और उद्योजकों आदि सभी को सहायता दी जा रही है ताकि वो इस संकट काल में दोबारा अपने पैरों पर खड़े हो सके | हमारा उद्देश्य है कि हम हमारे जरूरत की ज्यादा से ज्यादा चीजों का निर्माण भारत में ही करे | हम आयात पर कम से कम निर्भर रहे | लोगों को स्वरोजगार की आदत डाले ताकि वो रोजगार माँगनेवाला बनने के बजाय रोजगार का निर्माण करनेवाला बने |

आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की दिशा के प्रथम चरण में चिकित्सा, वस्त्र, इलेक्ट्रॉनिक्स, प्लास्टिक, खिलौने जैसे क्षेत्रों को प्रोत्साहित किया जाएगा तथा द्वितीय चरण में रत्न एवं आभूषण, फार्मा, स्टील जैसे क्षेत्रों को प्रोत्साहित किया जाएगा। सरकार ने आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की दिशा में उन 10 क्षेत्रों की पहचान की है, जिनमें घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा। सरकार ने इन 10 क्षेत्रों के आयात में कटौती का भी निर्णय किया है। इसमें फर्नीचर, फूट वेयर और एयर कंडीशनर, पूंजीगत सामान तथा मशीनरी, मोबाइल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स, रत्न एवं आभूषण, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल आदि शामिल हैं। आत्मनिर्भर राहत पैकेज़ के माध्यम से न केवल सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों क्षेत्र में सुधारों की घोषणा की गई, अपितु इसमें दीर्घकालिक सुधारों; जिनमें कोयला और खनन क्षेत्र जैसे क्षेत्र शामिल है, की घोषणा की गई थी।

आत्मनिर्भर भारत योजना वैसे तो काफी महत्वाकांक्षी और आदर्शवादी है किंतु इसके सामने कई चुनौतियाँ भी हैं | हमें यह सोचना पड़ेगा कि क्या आधुनिक अर्थव्यवस्था में यह संभव है ? क्या एक राष्ट्र अपनी जरूरत की हर चीज का उत्पादन स्वयं कर सकता है ? और अचानक हमें आत्मनिर्भरता को लक्ष्य बनाने की जरूरत क्यों आ पड़ी ? हमें यह भी ध्यान रखना है कि अत्मनिर्भार भारत बहुत अधिक वित्तीय और तकनीकी संसाधनों की आवश्यकता होगी । भारतीय उद्योग कई क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों की तरह ऊँची गुणवत्ता वाले सामान नहीं बना पाते । उनके लिए विदेशी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करना काफी मुश्किल है | इसके अलावा विश्व व्यापार संगठन में भारत द्वारा आयात में कटौती की दिशा में अपनाए जाने वाले उपायों को चुनौती भी दी जा सकती है।

आजादी के बाद हमारी जो प्रथम पंच वर्षीय योजना थी, उसका उद्देश्य भी आत्मनिर्भरता ही था | हमने विदेशी कंपनियों के लिए देश के दरवाजें बंद कर दिये थे और यह कोशिश की थी कि हमारी जरूरत की हर चीज का उत्पादन भारत में ही हो | भारतीय बाज़ारों में सिर्फ भारत में बने सामान मिलते थे | चालीस वर्षों तक हमने अपनी कोशिश जारी रखी किंतु अंत में असफलता हमारे हाथ लगी | 1990 में हमें हमारी अर्थव्यवस्था इतनी बिगड़ी कि हमें विदेशी कंपनियों के लिए अपना बाजार खोलना पड़ा |

आज यदि हम भारतीय बाजार देखें तो चीनी, अमेरिकी, जापानी, कोरियाई आदि देशो के सामान भरे पड़े हैं | हमारे जीवन की रोज़मर्रा की चीजों से लेकर बड़ी-बड़ी मशीनों तक सब बाहर से आ रहे हैं | इन सामानों को आयात करने में बहुमूल्य विदेशी मुद्रा खर्च हो रही है | विदेशी व्यापार के मामले में हमारा आयात, निर्यात की अपेक्षा काफी अधिक है | हमारा जीवन स्तर तो बढ़ गया है किंतु विदेशियों पर निर्भरता भी बढ़ गयी है |

कोई व्यक्ति यह पूछ सकता है कि विदेशियों पर निर्भरता बढ्ने में बुराई क्या है | वास्तव में सोचा जाये तो विदेशियों पर निर्भरता अपने आप में कोई बुरी चीज नहीं है | यदि हर राष्ट्र अपनी जरूरतों के लिए एक दूसरे पर निर्भर रहे तो यह विश्व शांति के लिए अच्छा है | दो राष्ट्र आपस में युद्ध करने से पहले सौ बार सोचेंगे क्योंकि उन्हें एक दूसरे की जरूरत है |

आधुनिक अर्थव्यवस्था के सिद्धान्त भी यही कहते हैं कि किसी भी समाज को अपनी जरूरत की सारी चीजों का उत्पादन करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए | उसे सिर्फ उन्ही चीजों का उत्पादन करना चाहिए जिसमें वो बेहतर हो | अपनी बनाई हुई बेहतर चीजों को दुनिया भर में बेचो और अपनी जरूरत की चीजों को दूसरे से खरीदो | आधुनिक अर्थव्यवस्था इसी बात का समर्थन करती है | 1990 से हम भी इसी नीति का पालन कर रहे हैं | इससे हमारे देश को बहुत लाभ भी हुआ है | देश की अर्थव्यवस्था पहले से बहुत अच्छी स्थिति में है | तो ऐसे में हमें दोबारा आत्मनिर्भरता को लक्ष्य बनाने की जरूरत क्यों आ पड़ी ?

कोरोना महामारी ने हमें इस बात का एहसास दिला दिया कि एक सीमा से ज्यादा दूसरे देश पर निर्भरता हमारे लिए घातक हो सकती है | हम अब तक चिकित्सा के लिए लगनेवाली बहुत सी चीजों के लिए विदेशियों पर निर्भर थे | कोरोना के समय पश्चिमी देशों ने चिकित्सा की सामग्री को पूरे दुनिया में महँगे दामों में खरीद लिया | भारत तथा अन्य गरीब देशों के पास इतना पैसा नहीं है कि वो धनी देशों का मुक़ाबला कर सके | नतीजा यह हुआ कि वेंटीलेटर, पीपीई किट आदि की भारी किल्लत हो गयी | हम अपने देश के नागरिकों को बचाने में असमर्थ हो गए |

इसके अलावा विदेशी देश अपनी निर्यात की गयी चीजों द्वारा भारत में जासूसी भी करते रहते हैं | चीन की कंपनियों पर पूरी दुनिया में जासूसी के आरोप लग रहे हैं | कभी कभी मुसीबत के समय तो विकसित देश भारत को सामान बेचने से मना भी कर देते हैं | 1965 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध और 1999 के कारगिल युद्ध में अमेरिका से हमें कुछ ऐसा ही अनुभव मिला था | इन उदाहरणों से यह तो तय है कि परस्पर निर्भरता सुनने में तो बड़ी अच्छी लगती है लेकिन व्यावहारिक नहीं है |

अपने सारे खट्टे-मिट्ठे अनुभवों को ध्यान में रखते हुए अब हमने आत्मनिर्भरता की तरफ कदम बढ़ाने का निश्चय कर लिया है | लक्ष्य भले कठिन हो पर हमारे पास और कोई चारा नहीं है | इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार बड़ी मात्रा में संसाधन भी लगा रही है | अब यह पूरे देशवासियों की ज़िम्मेदारी बनती है कि भारत को आत्मनिर्भर बनाने के सपने को साकार करने के लिए जी जान लगा दे ताकि फिर कभी संकट के समय हम असहाय अनुभव न करे |

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