आधुनिक शिक्षा प्रणाली में परीक्षाएँ अनिवार्य हैं | इसके पक्ष या विपक्ष में अपने विचार लिखिए |

परीक्षाएँ वर्त्तमान शिक्षा पद्धति का आवश्यक अंग है | विद्यार्थी की योग्यता को नापने के लिए यह एक महत्वपूर्ण साधन है | किसी छात्र की क्षमता जांचने के लिए परीक्षाएँ बहुत उपयोगी हैं। परीक्षा के द्वारा सम्बंधित विषय में विद्यार्थिओं की गुणवत्ता का काफी हद तक सही आकलन किया जा सकता है | विद्यार्थिओं का भविष्य बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि वे परीक्षाओं में किस तरह का प्रदर्शन करते हैं |

परीक्षाओं की उपयोगिता और अनिवार्यता को लेकर देश में कई वर्षों से बहस छिड़ी है | कुछ लोग परीक्षा को अनिवार्य मानते हैं | तो कुछ लोगों को परीक्षाओं से लाभ कम और हानि ज्यादा दिखती है | उनके अनुसार परीक्षाएँ विद्यार्थिओं पर अनावश्यक दवाब लाती हैं | विद्यार्थी विषय को समझने का प्रयत्न कम करते हैं | किसी तरह रटकर परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना विद्यार्थिओं का ध्येय बन जाता है | ऐसी अनेक बुराइयाँ गिनाई जाती हैं |

परीक्षा प्रणाली में कुछ खामियाँ तो हैं किन्तु वो तो संसार की हर व्यवस्था में होती है | इसमे कई खूबियाँ भी तो है | परीक्षा का दवाब विद्यार्थिओं को परिश्रम करने की प्रेरणा देते हैं | वो उस विषय पर समय देना शुरू करते हैं | अब जिस विषय को कोई विद्यार्थी बार-बार पढ़ेगा, उस विषय में उसका ज्ञान तो बढेगा ही | पढ़ने की वजह चाहे कोई हो | इसके अलावा मेहनत किये हुए विद्यार्थी के लिए परीक्षा का परिणाम एक इनाम की तरह होता है | यदि परीक्षाएँ न होती तो विद्यार्थों में परिश्रम का उत्साह कहाँ से आएगा | यह तो मानवीय स्वभाव है कि उसे कुछ ऐसा चाहिए जहाँ उसकी योग्यता दिखे, उस योग्यता को सराहा जाए वहां वो अधिक कठोर परिश्रम करता है | परीक्षाएँ विद्यार्थी की योग्यता, उसके परिश्रम को बताने वाले प्रमाण पत्र की तरह हैं |

कई लोग राय देते हैं कि परीक्षा के कारण बच्चों पर अनावश्यक दवाब आता है अतः परीक्षाएँ नहीं होनी चाहिए | पर इस दवाब के सकारात्मक प्रभाव को वे नहीं देखते | विद्यार्थिओं में अपार योग्यता छुपी होती है, उस योग्यता को बाहर लाने के लिए यह आवश्यक है कि वे परिश्रम करें | परीक्षा का दवाब बच्चों से परिश्रम करवाता है | इससे उसकी योग्यताएँ विकसित होती हैं | और इसके विपरीत परीक्षाएँ न हो तो ज्यादातर विद्यार्थी पढाई की तरफ ध्यान भी नहीं देते | वर्त्तमान समय में सरकार ने जो नियम बनाया है कि दसवी तक विद्यार्थिओं को अनुत्तीर्ण नहीं करना है भले परीक्षा में उनका प्रदर्शन कैसा भी हो | इसका नतीजा बहुत बुरा हो रहा है | शिक्षा का स्तर दिन प्रतिदिन गिर रहा है | कई विद्यालयों से यह शिकायत आ रही है कि विद्यार्थी अब पढाई को लेकर गंभीर नहीं हैं क्योंकि उन्हें पता है कि परीक्षा में उनका प्रदर्शन कोई मायने नहीं रखता | उन्हें तो अगली कक्षा में जाना ही है |

इन सब बातों के अलावा आज तक किसी ने परीक्षा का कोई दूसरा बेहतर विकल्प सुझा नहीं पाया है | लोग ग्रेडिंग सिस्टम की बात करते हैं जो विदेशों की नक़ल है | जिसमें विद्यार्थी को पढ़ाने वाला शिक्षक उसका मूल्यांकन करेगा | यह तरीका बहुत ज्यादा दोषपूर्ण है और इसके दुरुपयोग की संभावना बहुत ज्यादा है | पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी सिर्फ एक व्यक्ति को दे देना और वो अपने काम को सही ढंग से कर रहा है या नहीं इसपर निगरानी रखने का तरीका न होना यह अपने आप में बहुत बड़ा दोष है | जहाँ इस तरह की व्यवस्था है वहाँ भेदभाव के कई सारे आरोप लग चुके हैं | ग्रेडिंग सिस्टम में यह कैसे पता चलेगा कि शिक्षक विद्यार्थी को उसकी प्रतिभा के आधार पर अच्छा ग्रेड दे रहा है या अपने व्यक्तिगत काम करवा के अच्छे ग्रेड दे रहा है |

विद्यार्थियों पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभाव व कोई दूसरा बेहतर विकल्प न होने के कारण मेरा ऐसा मानना है कि वर्त्तमान समय में परीक्षाएँ अनिवार्य हैं |

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